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NEFT कैसे काम करता है ?

 

NEFT (National Electronic Funds Transfer) 


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NEFT का पूरा नाम National Electronic Funds Transfer (राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर) है। यह भारत में एक राष्ट्रव्यापी भुगतान प्रणाली है, जिसकी मदद से कोई भी व्यक्ति या संस्था एक बैंक खाते से देश के किसी अन्य बैंक खाते में सुरक्षित रूप से ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर कर सकती है। जब आप एक बैंक के खाते से दूसरे बैंक के खाते में पैसा ट्रांसफर करते है तो वो NEFT  या RTGS से होता है , पिछले लेखों में हमने विभिन्न प्रकार के अकाउंट जैसे बचत खाता , चालू खाता, डिपॉजिट  स्कीम्स , PPF इत्यादि के बारे में विस्तार से चर्चा की , अब हम पैसा एक बैंक से दूसरे बैंक में किस प्रकार भेजा जाता है , उसके विषय में विस्तार से जानेंगे , आइए अब हम सबसे पहले  ये जानते है कि NEFT  और RTGS से पहले यह कम कैसे होता था ।  हम शुरुवात इतिहास से करते है  ,आपने NEFT के बारे में अवश्य सुना होगा , जब आप बैंक में जाते है NEFT करने , बैंक आपको एक फॉर्म दे देता है , और आप भर कर उसके साथ चेक जोड़कर  दे देते है , और आपका पैसा कुछ ही देर में दूसरे बैंक में पहुंच जाता है , पर पहले ये सब इतना आसान नहीं था , आइए अब हम सबसे पहले समझते है पहले यह प्रक्रिया कैसे काम करती थी ।

NEFT और RTGS (जो कि 2000 के दशक के मध्य में आए) से पहले, भारत में एक बैंक से दूसरे बैंक में पैसे ट्रांसफर करना काफी लंबा और कागजी प्रक्रिया वाला काम था। उस समय मुख्य रूप से निम्नलिखित तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था:

1. डिमांड ड्राफ्ट (Demand Draft - DD)

डिमांड ड्राफ्ट या डीडी कभी न कभी तो आप ने अवश्य बनवाया होगा , किसी न किसी काम के लिए , पहले वह एक माध्यम था एक बैंक से दूसरे बैंक में पैसा देने के लिए ,  जिस व्यक्ति को पैसे भेजने होते है , वह अपने बैंक जाता है  और एक 'डिमांड ड्राफ्ट' फॉर्म भरकर उतनी राशि (प्लस बैंक का कमीशन) जमा करता है , और बैंक उसको DD दे देता है , और उसे  जहां जमा करना होता है , वहां जमा कर देता है , इसका इस्तेमाल आज भी बहुत सारे काम जैसे फीस जमा करना , फॉर्म भरना , लोन का पैसा देना, टेंडर  इत्यादि के लिए होता है , पर पहले यही एक माध्यम होता था , आज भी डिमांड ड्राफ्ट का इस्तेमाल  होता है क्योंकि ये कभी बाउंस नहीं होते  इसे कैश की तरह ही समझा जाता है ।

2. चेक (Cheques) और क्लियरिंग हाउस (Clearing House)

आज भी चेक का इस्तेमाल होता है , पर आज चेक एक ही दिन में क्लियर हो जाता है , पहले ऐसा नहीं होता था , लोग एक-दूसरे को अकाउंट पेयी चेक (Account Payee Cheque) देते थे, पाने वाला व्यक्ति चेक को अपने बैंक खाते में जमा करता था। बैंक उस चेक को क्लियरिंग हाउस (Clearing House) में भेजते थे, जहां विभिन्न बैंकों के कर्मचारी आपस में भौतिक चेक का आदान-प्रदान करके हिसाब किताब करते थे इस प्रक्रिया में भी आमतौर पर 3 से 7 कार्य दिवसों (Working Days)  या कभी कभी बाहर का चेक होता था तो इससे भी ज्यादा  का समय लग जाता था। आपने भी कभी न कभी किसको तो चेक जारी किया ही होगा ।

3. टेलीग्राफिक ट्रांसफर (Telegraphic Transfer - TT)

यह मुख्य रूप से बड़े व्यावसायिक लेन-देन या बैंक की अपनी शाखाओं के बीच तत्काल पैसे भेजने का एक पुराना तरीका था ,इसमें एक बैंक शाखा दूसरी बैंक शाखा को टेलीग्राफ या फैक्स (Fax) के जरिए एक अधिकृत संदेश भेजती थी, जिसके आधार पर दूसरी शाखा पैसे का भुगतान करती थी। हालांकि, यह आम जनता के लिए बहुत महंगा और जटिल था। यह आम जनता कम ही इस्तेमाल करती थी , बड़े व्यापारी जिसको रोज लेन देन करना होता था वहीं इस्तेमाल करते थे ।

4. मेल ट्रांसफर (Mail Transfer - MT)

यह डिमांड ड्राफ्ट का ही एक रूप था, लेकिन इसमें एक बैंक शाखा सीधे दूसरी शहर की बैंक शाखा को डाक (Mail) के जरिए पत्र भेजकर भुगतान करने का निर्देश देती थी। इसमें भी काफी समय लगता था। इसके फॉर्म होते थे जो भर कर भेजे जाते थे ।
अब ये सब पुराने जमाने की बात लगती है , लेकिन इतिहास जानने के लिए यह बताना आवश्यक था , अब आप समझ गए होगे आज का जीवन कितना आसान हो गया है ।

इन पुरानी प्रणालियों में कागजी कार्रवाई बहुत ज्यादा होती थी, मैन्युअल गलतियों की गुंजाइश रहती थी और पैसों के ट्रांसफर में कई दिन लग जाते थे।पहले बैंक का इस्तेमाल  बहुत कम लोग करते थे , आम आदमी कैश से ही काम कर लेता था। NEFT और RTGS जैसे टेक्नोलॉजी  के आने से यह  प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल  और बहुत आसान बना दिया और कुछ ही मिनटों या घंटों में आपका काम हो जाता है ।

क्या आप जानते है ?

NEFT (National Electronic Funds Transfer) का इतिहास भारत की डिजिटल बैंकिंग और वित्तीय सुधारों का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा खुदरा भुगतान (Retail Payments) को तेज, सुरक्षित और कागज-मुक्त बनाने के लिए लाया गया था।

NEFT के विकास और सफर के मुख्य ऐतिहासिक पड़ाव निम्नलिखित हैं:

 शुरुआत से पहले की व्यवस्था (SEFT)

NEFT से पहले, RBI ने नवंबर 2001 में SEFT (Special Electronic Funds Transfer) की शुरुआत की थी। यह चुनिंदा शहरों और चुनिंदा बैंकों की शाखाओं के बीच ही काम करती थी। इसकी सीमाएं बहुत थीं और यह देशव्यापी नहीं थी, इसलिए इसे एक व्यापक और बेहतर प्रणाली से बदलने की जरूरत महसूस हुई।

 NEFT की आधिकारिक शुरुआत (नवंबर 2005)

पुरानी SEFT प्रणाली को पूरी तरह से बंद करके RBI ने नवंबर 2005 में आधुनिक NEFT प्रणाली की शुरुआत की। इसका मुख्य उद्देश्य देश के किसी भी कोने से एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में इलेक्ट्रॉनिक तरीके से आसानी से पैसे ट्रांसफर करना था।

 बैच प्रोसेसिंग (Batch System) का दौर

शुरुआत में NEFT तुरंत (Real-Time) पैसे ट्रांसफर नहीं करता था। यह बैच (Batch) के आधार पर काम करता था। शुरुआत में दिनभर में इसके कुछ ही तय समय (बैच) होते थे मुश्किल से ६ या ७ बैच होते थे दिन भर में । जैसे-जैसे डिजिटल लेन-देन बढ़ने लगे, RBI ने बैचों की संख्या बढ़ाई और बाद में इसे घटाकर आधे-आधे घंटे (Half-hourly batches) का कर दिया गया, जिससे ग्राहकों को दिनभर में कई बार जल्दी पैसे ट्रांसफर होने की सुविधा मिलने लगी।

 24x7x365 उपलब्धता (दिसंबर 2019)

डिजिटल बैंकिंग को बढ़ावा देने के लिए RBI ने 16 दिसंबर 2019 से NEFT सेवा को साल के सातों दिन, 24 घंटे और छुट्टियों के दिन भी चालू कर दिया। इसके बाद से ग्राहकों को बैंक के कामकाजी घंटों या छुट्टियों का इंतजार करने की जरूरत खत्म हो गई।

बेनिफिशरी नेम वेरिफिकेशन (अक्टूबर 2024):
सुरक्षा को और मजबूत करने और फ्रॉड रोकने के लिए RBI ने इसमें खाताधारक का नाम सत्यापित करने की सुविधा अनिवार्य कर दी, ताकि पैसे ट्रांसफर करते समय असली नाम दिखाई दे सके। आज आप दूसरे बैंक का अकाउंट भी वेरिफाई कर सकते है ।

आज NEFT भारत की भुगतान प्रणालियों (जैसे UPI और RTGS) के साथ मिलकर देश की अर्थव्यवस्था की एक मजबूत और भरोसेमंद नींव बन चुका है।



NEFT कैसे काम करता है? 

NEFT प्रणाली बैच (Batch) के आधार पर काम करती है, यानी पैसे तुरंत एक खाते से दूसरे खाते में सीधे ट्रांसफर नहीं होते, बल्कि यह एक तय समय अंतराल में समूह बनाकर प्रोसेस होते हैं। आइए पूरे प्रक्रिया को विस्तार से समझते है ।

 १. विवरण दर्ज करना:

 पैसे भेजने वाले को इंटरनेट बैंकिंग या मोबाइल बैंकिंग ऐप में पाने वाले (Beneficiary) का नाम, खाता संख्या (Account Number), बैंक का IFSC कोड, और ट्रांसफर की जाने वाली राशि दर्ज करनी होती है। जब आप बैंक में फॉर्म भर कर देते है , या अपने इंटरनेट बैंकिंग या मोबाइल बैंकिंग से  पाने वाले का नाम , अकाउंट नंबर, ifsc code , और  धन राशि भरते है ।
 जब आप NEFT का अनुरोध भेजते हैं, तो आपका बैंक उस ट्रांजैक्शन को अपने सिस्टम में दर्ज करता है। आप फॉर्म जमा कर के आ जाते है  या अपने NetBanking या मोबाइल बैंकिंग से submit पर क्लिक करते है , तब बैंक अपने cbs में ट्रांजैक्शन डिटेल दर्ज करता है ।

 बैच प्रोसेसिंग:

 RBI द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार, NEFT ट्रांजैक्शन आधे-आधे घंटे के बैच (Batches) में प्रोसेस किए जाते हैं। यानी दिनभर में हर 30 मिनट पर एक नया बैच बनता है जिसमें उस समयावधि के सभी ट्रांसफर शामिल होते हैं।
 सभी  बैंकों के अनुरोध नेशनल क्लियरिंग सेंटर (जो कि RBI के पास है) पर जाते हैं, जहां बैंकों के बीच पैसों का मिलान और निपटान (Settlement) होता है। सभी बैंकों के सारे ट्रांजैक्शन एक स्थान पर इकट्ठा किए जाते है , और बैंक के अनुसार  डेबिट क्रेडिट फाइनल किया जाता है । सभी बैंकों को अपने ट्रांजैक्शन के अनुसार पैसे ट्रांसफर कर दिए जाते है ।
सभी बैंकों के अपने NEFT/RTGS cell होते है जो इस प्रक्रिया को पूरा करने में भागीदारी निभाते है ।
 
सेटलमेंट की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, पाने वाले (Beneficiary) के बैंक खाते में  उस बैंक द्वारा पैसे जमा कर दिए जाते हैं और भेजने वाले को एसएमएस या ईमेल के जरिए पुष्टि मिल जाती है। संबंधित बैंक अपनी लिस्ट के अनुसार लोगों को पैसे उनके अकाउंट में जमा कर देते है ।

यह सब काम सिस्टम से होता है , इसलिए समय बहुत कम लगता है , और आपको पता नहीं चलता इतना जल्दी इतने ट्रांजैक्शन कंप्लीट हो जाते है ,और अगर किसी के डिटेल्स गलत हो तो पैसा भेजने वाले के  अकाउंट में वापस कर दिया जाता है ।

NEFT की मुख्य विशेषताएँ:


 NEFT सेवा साल के सातों दिन, 24 घंटे और छुट्टियों के दिन भी उपलब्ध है। आप किसी भी समय पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं। इसका टाइम भी बैंक के हिसाब से अलग अलग निर्धारित कर सकते है , आपके बैंक का टाइम पता लगा सकते है आप।

 NEFT के जरिए आप कम से कम (जैसे 1 रुपया) से लेकर कितनी भी बड़ी राशि ट्रांसफर कर सकते हैं (हालांकि अलग-अलग बैंक अपनी तरफ से दैनिक सीमा तय कर सकते हैं)।
 
RBI के सुरक्षित नेटवर्क पर काम करता है, और इसमें बेनिफिशरी का नाम वेरीफाई करने की सुविधा पहले नहीं मिलती थी अभी कुछ महीने पहले शुरू की गई है। 

NEFT पर चार्ज कितना होता है ?

यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप पैसे कैसे ट्रांसफर कर रहे हैं।
1. ऑनलाइन NEFT (इंटरनेट बैंकिंग या मोबाइल ऐप):
 पूरी तरह मुफ्त (Free)
 यदि आप अपने सेविंग अकाउंट (बचत खाता) से मोबाइल बैंकिंग, नेट बैंकिंग या बैंक के ऐप के जरिए खुद ऑनलाइन NEFT करते हैं, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के दिशानिर्देशों के अनुसार अधिकांश बैंक कोई शुल्क नहीं लेते हैं। लेकिन अपने बैंक के चार्जेज अवश्य पता कर ले ।

 यदि आप बैंक की शाखा (Branch) में जाकर फॉर्म भरकर NEFT करवाते हैं, तो बैंक उस पर शुल्क (Service Charge) वसूलते हैं।
 यह शुल्क ट्रांसफर की जाने वाली राशि के स्लैब (Slab) के हिसाब से अलग-अलग होता है। जैसे:
   * 10,000 रुपये तक: लगभग ₹2.50 से ₹5 + GST
   * 10,000 से 1 लाख रुपये तक: लगभग ₹5 से ₹10 + GST
   * 1 लाख से 2 लाख रुपये तक: लगभग ₹15 से ₹25 + GST
   * 2 लाख रुपये से अधिक: लगभग ₹25 से ₹50 + GST

अगर कोई दूसरा व्यक्ति आपके खाते में NEFT के जरिए पैसे भेजता है, तो पैसे प्राप्त करने पर (Inward Credit) बैंक कोई चार्ज नहीं काटते हैं।

सलाह: हमेशा मोबाइल या नेट बैंकिंग के जरिए ही NEFT करें, ताकि आप अतिरिक्त ब्रांच चार्ज से बच सकें। NEFT करने से पहले अपने बैंक के charges अवश्य जान ले ।

इस लेख में हमने NEFT से जुड़ी सभी विषयों पर चर्चा करने का प्रयास किया । अगली बार आप जब NEFT करने जाएंगे तो आपको उसके बारे में सब कुछ जानकारी होगी । यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।
धन्यवाद।





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