Loan (ऋण/कर्ज)
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क्या आप जानते है ?
लोन यानी ऋण/कर्ज की शुरुआत आधुनिक बैंक बनने से बहुत पहले हो चुकी थी। जब लोगों को व्यापार, खेती या व्यक्तिगत जरूरतों के लिए तत्काल धन की आवश्यकता होती थी, तब वे दूसरे व्यक्ति या साहूकार से धन उधार लेते थे और बाद में उसे ब्याज सहित वापस करते थे।
लोन (ऋण) का इतिहास मानव सभ्यता के शुरुआती दौर से जुड़ा हुआ है, जब मुद्रा (करेंसी) का आविष्कार नहीं हुआ था और लेन-देन वस्तु विनिमय (बार्टर सिस्टम) पर आधारित था।
वस्तु विनिमय प्रणाली (बार्टर सिस्टम - लगभग 3000 ईसा पूर्व से पहले):
प्राचीन काल में लोग धन या सिक्कों के बजाय अनाज, मवेशी, औजार या अन्य जरूरी सामान उधार लेते और चुकाते थे। इसे दुनिया का सबसे पुराना रूप माना जाता है। एक सामान लेना और दूसरा देना ही बार्टर सिस्टम कहते है , आपने इतिहास पढ़ते समय अवश्य पढ़ा होगा ।
इतिहास का पहला लिखित साक्ष्य मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) की प्राचीन सभ्यताओं से मिलता है। यहाँ मिट्टी की गोलियों (Clay Tablets) पर अनाज और चांदी के रूप में दिए जाने वाले ऋण और ब्याज दरों का हिसाब दर्ज किया जाता था।
प्राचीन यूनान और रोम (लगभग 500 ईसा पूर्व - 500 ईस्वी): इन सभ्यताओं में मंदिरों को सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता था, जहाँ लोग अपनी संपत्ति जमा करते थे और मंदिर के पुजारी व्यापारियों व जरूरतमंदों को ब्याज पर कर्ज देते थे। यहीं से औपचारिक बैंकिंग और ऋण प्रणाली की शुरुआत हुई।
मध्यकालीन यूरोप और साहूकार (5वीं से 15वीं शताब्दी): इस दौरान कैथोलिक चर्च द्वारा ब्याज लेना (जिसे सूदखोरी कहा जाता था) प्रतिबंधित था, जिससे यह व्यवसाय मुख्य रूप से यहूदी समुदायों और निजी साहूकारों के हाथ में चला गया।
आधुनिक बैंकिंग प्रणाली (17वीं शताब्दी के बाद): दुनिया का पहला केंद्रीय बैंक 'स्वीडिश रिक्सबैंक' 1668 में स्थापित हुआ और 1694 में 'बैंक ऑफ इंग्लैंड' की स्थापना हुई। इसके बाद कागजी मुद्रा, चेक और विधिवत लोन एग्रीमेंट की शुरुआत हुई।
भारत में वैदिक काल से ही साहूकार, महाजन और सेठ ऋण देने का काम करते थे। आपने फिल्मों में देखा होगा साहूकार ने खेती रख कर ब्याज पर पैसा दिया और बाद में खेत वापस नहीं किया, लेकिन वहीं साहूकारों ने प्रत्यक्ष रूप में लोन के शुरुआत की ।ब्रिटिश काल में आधुनिक बैंकिंग की नींव पड़ी ।
प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय व्यापार में जब औपचारिक कंपनियाँ नहीं थीं, तब व्यापारी और राजघराने 'तपशील', 'ऋण-पत्र' या 'तौवीज़' जैसे लिखित दस्तावेजों के जरिए कर्ज का लेन-देन करते थे। हमारा देश भारत पहले से ही समृद्ध रहा है जहां से सभी देश व्यापार करते थे और बदले ने सोना देते थे ।
उस दौर में हुंडी एक प्रकार का अल्पकालिक ऋण और विनिमय पत्र था, लेकिन बड़े व्यापारिक उपक्रमों और रियासतों को दीर्घकालिक कर्ज देने के लिए राजाओं या साहूकारों द्वारा मुहरबंद लिखित अनुबंध जारी किए जाते थे, जिन्हें आधुनिक ऋण पत्र का शुरुआती रूप माना जा सकता है।
भारत में आधुनिक अर्थों में ऋण पत्रों (Debentures) की शुरुआत ब्रिटिश शासनकाल के दौरान, विशेषकर 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई जब देश में रेलवे, प्लांटेशन, कपड़ा मिलें और कोयला खदानें स्थापित हो रही थीं ।
डिबेंचर्स (Debentures) एक प्रकार का कर्ज पत्र या प्रतिभूत (Instrument) होते हैं, जिनका उपयोग कंपनियाँ या सरकारें जनता से ऋण (Loan) जुटाने के लिए करती हैं। जब कोई कंपनी बैंक से लोन लेने के बजाय सीधे आम जनता या निवेशकों से पैसा उधार लेना चाहती है, तो वह डिबेंचर्स जारी करती है। डिबेंचर खरीदने वाला व्यक्ति कंपनी का शेयरधारक (Shareholder) नहीं बनता, बल्कि कंपनी का लेनदार (Creditor) बन जाता है। आज के समय में ये मार्केट भारत में 54 से 56 लाख करोड़ का है ।
इन बड़े उद्योगों को स्थापित करने के लिए भारी-भरकम पूंजी (Capital) की आवश्यकता थी, जिसे अकेले बैंकों से जुटाना संभव नहीं था। तब कंपनियों ने आम जनता और संस्थागत निवेशकों से सीधे कर्ज लेने के लिए 'कंपनी अधिनियम' (Companies Act) के तहत ऋण पत्र जारी करना शुरू किया।
भारत में कंपनी अधिनियम, 1866 और बाद के संशोधनों (जैसे 1913 और 1956 का अधिनियम) ने ऋण पत्रों को कानूनी मान्यता और सुरक्षा प्रदान की, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा।
बैंकिंग प्रणाली के साथ संबंध
ऐतिहासिक रूप से वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks) कंपनियों को दिए जाने वाले ऋण के बदले उनकी संपत्तियों के साथ-साथ ऋण पत्रों को गिरवी या सुरक्षित साधन के रूप में स्वीकार करते थे।
चुकी शुरुआती दौर में निवेशक एक अनजान कंपनी को पैसा देने से डरते थे, इसलिए बैंकिंग और वित्तीय इतिहास में 'डिबेंचर ट्रस्टी' की अवधारणा आई। एक बैंक या वित्तीय संस्थान ट्रस्टी के रूप में काम करता था ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कंपनी निवेशकों के हितों और संपत्तियों की सुरक्षा कर रही है।
समय के साथ, पारंपरिक ऋण पत्रों का स्थान गैर-परिवर्तनीय ऋण पत्रों (NCDs) और सरकारी बॉन्ड ने ले लिया।
भारतीय पूंजी बाजार में 1980 और 1990 के दशक के बाद इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (IDBI), आईसीआईसीआई (ICICI) और अन्य वित्तीय संस्थानों ने उद्योगों के विकास के लिए बड़े पैमाने पर डिबेंचर बाजार को बढ़ावा दिया।
आज के दौर में ऋण पत्र केवल एक कर्ज का कागज नहीं रह गए हैं, बल्कि यह भारतीय शेयर बाजार (NSE/BSE) और ऋण बाजार (Debt Market) का एक मुख्य स्तंभ हैं, जिनके जरिए कंपनियाँ बैंकों पर निर्भर हुए बिना सीधे जनता से दीर्घकालिक पूंजी जुटाती हैं।
RBI के इतिहास संबंधी दस्तावेज के अनुसार भारत में आधुनिक प्रकार की कमर्शियल बैंकिंग की शुरुआत 18वीं शताब्दी में हुई और बैंक ऑफ बॉम्बे तथा बाद में बैंक ऑफ हिंदुस्तान जैसे संस्थान सामने आए। इसकी चर्चा हम सबसे पहले लेख बैंकिंग में कर चुके है ।
स्वतंत्रता के बाद बैंकिंग व्यवस्था को अधिक लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया गया। 1969 में प्रमुख बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद कृषि, छोटे व्यवसाय और कमजोर वर्गों को ऋण देने पर विशेष जोर बढ़ा। Priority Sector Lending की व्यवस्था इसी विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
हमने यहां से लोन के इतिहास को समझने का प्रयास किया , आइए अब आज के आधुनिक लोन सिस्टम के बारे में समझने की तरफ बढ़ते है ।
यानी लोन की मूल अवधारणा हजारों वर्ष पुरानी है, लेकिन आज का बैंक लोन उसी पुरानी उधार व्यवस्था का आधुनिक और अधिक व्यवस्थित रूप है। आज कई प्रकार के लोन है उपलब्ध है , जिनमें से बहुत सारे नाम आप जानते है , आइए अब एक आसान उदाहरण से इसे समझने का प्रयास करते है ।
मान लीजिए आपको ₹5 लाख की जरूरत है, लेकिन आपके पास ₹2 लाख हैं और आपको 3 लाख और चाहिए , आप अपने बैंक के पास गए । आपका बैंक आपको ₹3 लाख का लोन देता है। अब आपको बैंक के ₹3 लाख को ब्याज के साथ तय अवधि में किस्तों (EMI) के माध्यम से वापस करना होगा।
लोन के मुख्य हिस्से इस प्रकार है :-
1. Principal (मूलधन) – बैंक से लिया गया वास्तविक पैसा। 3 लाख जो बैंक ने आपको दिया ।
2. Interest (ब्याज) – बैंक द्वारा पैसे देने के बदले लिया जाने वाला शुल्क। मान लीजिए बैंक ने आपको 10 % साल के दर से लोन दिया है और fixed है । ब्याज दर दो तरह का होता है fixed और floating , एक जिसमें ब्याज दर जो शुरू में होता है , वो हमेशा रहता है उसे FIXED कहते है , और जो ब्याज दर बदलता रहता है , RBI जब रेट बदल दे उसे floating कहते है , इनकी विस्तार से चर्चा आगे करेंगे ।
3. Tenure (अवधि) – Loan चुकाने का समय। अवधि आपको 5 साल दी गई है ।
4. EMI – हर महीने चुकाई जाने वाली निश्चित किस्त। आपकी हर महीने की EMI 6374.11 /- जो कि 60 महीने के लिए है ।
5. Security/Collateral – कुछ Loans में बैंक के पास रखी जाने वाली संपत्ति/गारंटी। इसमें नहीं है क्योंकि यह पर्सनल लोन है ।
6. Credit Score/CIBIL – लोन मिलने और ब्याज दर तय होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सिबिल कैसे काम करता है जानने के लिए cibil लेख अवश्य पढ़ ले ।
इस लोन पर आप सब मिलाकर मूलधन और ब्याज आप 5 साल में 300000/- ब्याज 82446.77 /- दोनों मिलकर 382446.77/- 5 साल में हर महीने में 6374.11/- बैंक को देना होगा । इसे ही लोन कहते है । इसमें जो आपने मुख्य हिस्से है , वो लगभग सभी लोन में वही रहते है ।
अब आइए समझते है कि हम लोन को कुछ मुख्य प्रकार में किस प्रकार विभाजित कर सकते है :-
Retail Loan (रिटेल लोन):
व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए दिए जाने वाले ऋण, जैसे होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन और एजुकेशन लोन इत्यादि । जब आप अपने जरूरतों को पूरा करने के लिए जैसे कि घर खरीदने के लिए , गाड़ी खरीदने के लिए , या किसी और जरूरत के लिए पर्सनल लोन लेते है , पढ़ाई के लिए लोन ये सभी लोन को बैंक में रिटेल लोन कहते है । आगे हम एक एक की चर्चा विस्तार से करेंगे ।
Agriculture Loan (कृषि लोन):
खेती, फसल उत्पादन, बागवानी (जैसे अनार की खेती) और कृषि उपकरणों के लिए किसानों को दिए जाने वाले ऋण। खेती के लिए लिए जाने वाले सभी लोन कृषि लोन अंतर्गत आते है जैसे कि KCC (किसान क्रेडिट कार्ड), Agriculture Term loan , खेती की जमीन खरीदने के लिए लोन या कोई भी कृषि से जुड़ी योजना के लिए लोन । इनकी चर्चा हम आगे विस्तार से करेंगे ।
MSME Loan (एमएसएमई लोन):
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों, जैसे छोटी फैक्ट्रियों, दुकानों और सेवा प्रदाताओं को व्यवसाय के संचालन और विस्तार के लिए मिलने वाले ऋण। बिजनेस से जुड़ा कोई लोन आप लेते है , जैसे कि मुद्रा लोन , Msme Term Loan , PM विश्वकर्मा loan , PMEGP, CMEGP आदि , इनकी चर्चा भी हम आगे करेंगे ।
Corporate / Wholesale Loan (कॉर्पोरेट लोन):
बड़ी कंपनियों और औद्योगिक घरानों को बड़े पैमाने पर दिए जाने वाले व्यावसायिक ऋण। बड़े लोन जो कंपनियों को बिजनेस के लिए दिए जाते है PVT Ltd , Public LTD कम्पनियों के लिए ।
Secured & Unsecured Loan (सुरक्षित और असुरक्षित ऋण):
संपत्ति (जैसे जमीन, मकान या सोना) गिरवी रखकर मिलने वाले ऋण और बिना किसी गारंटी के साख के आधार पर मिलने वाले ऋण। मतलब जी लोन में कोई collateral नहीं होता, कोई अलग से सिक्योरिटी नहीं होता - जैसे कि जब आप कोई MSME लोन लेते है तो आपसे अलग से मतलब जो आप लोन लेकर खरीदना चाहते है , कोई मशीन या कुछ और , तो इस प्रकार के लोन को secured लोन , यानी collateral सिक्योरिटी के साथ । जिस लोन ने कोई collateral नहीं होता जैसे कि MUDRA लोन इसे Unsecured लोन कहते है ।
Short-term & Long-term Loan (अल्पकालिक और दीर्घकालिक ऋण):
हालांकि, बैंकिंग नियमों और ऋण के प्रकार के आधार पर कुछ शॉर्ट-term लोन कुछ हफ्तों से लेकर अधिकतम 12 से 18 महीनों तक के लिए भी दिए जा सकते हैं।
ध्यान रखे cc जो कि एक साल में renew होती है वो इसमें नहीं आती ।
लोन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :-
1. कभी भी आप लोन लेने के पहले अपने बैंक से सभी जानकारी जैसे कि लोन कितन है , कितने समय के लिए है , ब्याज कितना है , कौन सा लोन है , ब्याज fix है या Floating इत्यादि जानकारी ।
2. आपके लोन का sanction letter जरूर बैंक से एक कॉपी प्राप्त कर के ,जब बैंक से आप लोन लेते है , बैंक आप से सभी लोन के document साइन करा लेते है । Sanction के टर्म्स एंड कंडीशन , sign करने से पहले अच्छे से समझ ले।
3. अगर आप चाहते है कि आपका फाइनेंस अच्छा चलता रहे तो , आप अपने CIBIL की हेल्थ हमेशा अच्छी रखे , कभी भी कोई लोन overdue न होने दे , क्योंकि आज के समय में लोन के लिए CIBIL से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है ।
इस लेख में हमने लोन के बारे में अच्छे से समझने के प्रयास किया , हमने लोन से पहले की जरूरी बहुत सारे विषयों की पर चर्चा कि ।
जितने भी प्रकार के लोन होते है इनमें से किसी न किसी प्रकार में आ जाते हैं , यह लोन पर पहला लेख है , आगे के लेखों हम धीरे धीरे इनमें से एक एक प्रकार को विस्तार से समझेंगे । मैं आशा करता हु कि यह लेख आपको पसंद आया होगा ।
यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।
धन्यवाद ।
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