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लोन क्या होता है ?

Loan (ऋण/कर्ज) 

Loan type
Loan Type


लोन  वह धनराशि है जो बैंक या वित्तीय संस्था किसी व्यक्ति, व्यवसाय या संस्था को जरूरत पूरी करने के लिए उधार देती है, जिसे ग्राहक को तय समय में ब्याज सहित वापस चुकाना होता है।  शायद ही आज के समय में ऐसा हो  जिसने लोन के बारे में नहीं सुना हो , क्रेडिट कार्ड से लेकर बड़े लोन , और यहां तक कि कितने ही ऐप आज लोन दे रहे है । आप में  से सब लोगों ने कोई न कोई लोन लिया ही होगा , आज हम लोन पर बात करेंगे ,उसके इतिहास से लेकर धीरे धीरे बाद में एक एक प्रकार के लोन पर विस्तार से चर्चा करेंगे , आप बैंक से एक निश्चित राशि प्राप्त करते है , और उस पर ब्याज पहले से तय होता है , और तय समय में आपको चुकाना होता है । हमने सबसे पहले लेख में बैंकिंग क्या होती है इसके बारे में जानकारी प्राप्त की थी , बैंक का सबसे मुख्य काम  Deposit लेना और लोन देना ही हैं । वहीं बैंकों के आय का सबसे मुख्य  स्त्रोत है । अगर आपने डिपॉजिट के बारे में नहीं पढ़ा तो अवश्य  FD, RD, PPF, चालू खाता और बचत खाता के बारे में पढ़ ले । आइए सबसे पहले हम इसके इतिहास से शुरू करते है ।

क्या आप जानते है ?

लोन यानी ऋण/कर्ज की शुरुआत आधुनिक बैंक बनने से बहुत पहले हो चुकी थी। जब लोगों को व्यापार, खेती या व्यक्तिगत जरूरतों के लिए तत्काल धन की आवश्यकता होती थी, तब वे दूसरे व्यक्ति या साहूकार से धन उधार लेते थे और बाद में उसे ब्याज सहित वापस करते थे।

लोन (ऋण) का इतिहास मानव सभ्यता के शुरुआती दौर से जुड़ा हुआ है, जब मुद्रा (करेंसी) का आविष्कार नहीं हुआ था और लेन-देन वस्तु विनिमय (बार्टर सिस्टम) पर आधारित था।

वस्तु विनिमय प्रणाली (बार्टर सिस्टम - लगभग 3000 ईसा पूर्व से पहले):

प्राचीन काल में लोग धन या सिक्कों के बजाय अनाज, मवेशी, औजार या अन्य जरूरी सामान उधार लेते और चुकाते थे। इसे दुनिया का सबसे पुराना रूप माना जाता है। एक सामान लेना और दूसरा देना ही  बार्टर   सिस्टम कहते है , आपने इतिहास पढ़ते समय अवश्य पढ़ा होगा ।

इतिहास  का पहला लिखित साक्ष्य मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) की प्राचीन सभ्यताओं से मिलता है। यहाँ मिट्टी की गोलियों (Clay Tablets) पर अनाज और चांदी के रूप में दिए जाने वाले ऋण और ब्याज दरों का हिसाब दर्ज किया जाता था।

प्राचीन यूनान और रोम (लगभग 500 ईसा पूर्व - 500 ईस्वी): इन सभ्यताओं में मंदिरों को सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता था, जहाँ लोग अपनी संपत्ति जमा करते थे और मंदिर के पुजारी व्यापारियों व जरूरतमंदों को ब्याज पर कर्ज देते थे। यहीं से औपचारिक बैंकिंग और ऋण प्रणाली की शुरुआत हुई।

मध्यकालीन यूरोप और साहूकार (5वीं से 15वीं शताब्दी): इस दौरान कैथोलिक चर्च द्वारा ब्याज लेना (जिसे सूदखोरी कहा जाता था) प्रतिबंधित था, जिससे यह व्यवसाय मुख्य रूप से यहूदी समुदायों और निजी साहूकारों के हाथ में चला गया।

आधुनिक बैंकिंग प्रणाली (17वीं शताब्दी के बाद): दुनिया का पहला केंद्रीय बैंक 'स्वीडिश रिक्सबैंक' 1668 में स्थापित हुआ और 1694 में 'बैंक ऑफ इंग्लैंड' की स्थापना हुई। इसके बाद कागजी मुद्रा, चेक और विधिवत लोन एग्रीमेंट की शुरुआत हुई।

भारत में वैदिक काल से ही साहूकार, महाजन और सेठ ऋण देने का काम करते थे।  आपने फिल्मों में देखा होगा साहूकार ने खेती रख कर ब्याज पर पैसा दिया और बाद में खेत वापस नहीं किया, लेकिन वहीं  साहूकारों ने प्रत्यक्ष रूप में लोन के शुरुआत की   ।ब्रिटिश काल में आधुनिक बैंकिंग की नींव पड़ी ।

प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय व्यापार में जब औपचारिक कंपनियाँ नहीं थीं, तब व्यापारी और राजघराने 'तपशील', 'ऋण-पत्र' या 'तौवीज़' जैसे लिखित दस्तावेजों के जरिए कर्ज का लेन-देन करते थे। हमारा देश भारत पहले से ही  समृद्ध रहा है जहां से सभी देश व्यापार करते थे और बदले ने सोना देते थे ।

उस दौर में हुंडी एक प्रकार का अल्पकालिक ऋण और विनिमय पत्र था, लेकिन बड़े व्यापारिक उपक्रमों और रियासतों को दीर्घकालिक कर्ज देने के लिए राजाओं या साहूकारों द्वारा मुहरबंद लिखित अनुबंध जारी किए जाते थे, जिन्हें आधुनिक ऋण पत्र का शुरुआती रूप माना जा सकता है।

भारत में आधुनिक अर्थों में ऋण पत्रों (Debentures) की शुरुआत ब्रिटिश शासनकाल के दौरान, विशेषकर 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई जब देश में रेलवे, प्लांटेशन, कपड़ा मिलें और कोयला खदानें स्थापित हो रही थीं ।

डिबेंचर्स (Debentures) एक प्रकार का कर्ज पत्र या प्रतिभूत (Instrument) होते हैं, जिनका उपयोग कंपनियाँ या सरकारें जनता से ऋण (Loan) जुटाने के लिए करती हैं। जब कोई कंपनी बैंक से लोन लेने के बजाय सीधे आम जनता या निवेशकों से पैसा उधार लेना चाहती है, तो वह डिबेंचर्स जारी करती है। डिबेंचर खरीदने वाला व्यक्ति कंपनी का शेयरधारक (Shareholder) नहीं बनता, बल्कि कंपनी का लेनदार (Creditor) बन जाता है। आज के समय में ये मार्केट भारत में 54 से 56 लाख करोड़ का है ।

इन बड़े उद्योगों को स्थापित करने के लिए भारी-भरकम पूंजी (Capital) की आवश्यकता थी, जिसे अकेले बैंकों से जुटाना संभव नहीं था। तब कंपनियों ने आम जनता और संस्थागत निवेशकों से सीधे कर्ज लेने के लिए 'कंपनी अधिनियम' (Companies Act) के तहत ऋण पत्र जारी करना शुरू किया।

 भारत में कंपनी अधिनियम, 1866 और बाद के संशोधनों (जैसे 1913 और 1956 का अधिनियम) ने ऋण पत्रों को कानूनी मान्यता और सुरक्षा प्रदान की, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा।

बैंकिंग प्रणाली के साथ संबंध

ऐतिहासिक रूप से वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks) कंपनियों को दिए जाने वाले ऋण के बदले उनकी संपत्तियों के साथ-साथ ऋण पत्रों को गिरवी या सुरक्षित साधन के रूप में स्वीकार करते थे।

चुकी  शुरुआती दौर में निवेशक एक अनजान कंपनी को पैसा देने से डरते थे, इसलिए बैंकिंग और वित्तीय इतिहास में 'डिबेंचर ट्रस्टी' की अवधारणा आई। एक बैंक या वित्तीय संस्थान ट्रस्टी के रूप में काम करता था ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कंपनी निवेशकों के हितों और संपत्तियों की सुरक्षा कर रही है।

समय के साथ, पारंपरिक ऋण पत्रों का स्थान गैर-परिवर्तनीय ऋण पत्रों (NCDs) और सरकारी बॉन्ड ने ले लिया।

भारतीय पूंजी बाजार में 1980 और 1990 के दशक के बाद इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (IDBI), आईसीआईसीआई (ICICI) और अन्य वित्तीय संस्थानों ने उद्योगों के विकास के लिए बड़े पैमाने पर डिबेंचर बाजार को बढ़ावा दिया।

आज के दौर में ऋण पत्र केवल एक कर्ज का कागज नहीं रह गए हैं, बल्कि यह भारतीय शेयर बाजार (NSE/BSE) और ऋण बाजार (Debt Market) का एक मुख्य स्तंभ हैं, जिनके जरिए कंपनियाँ  बैंकों पर निर्भर हुए बिना सीधे जनता से दीर्घकालिक पूंजी जुटाती हैं।

RBI के इतिहास संबंधी दस्तावेज के अनुसार भारत में आधुनिक प्रकार की कमर्शियल बैंकिंग  की शुरुआत 18वीं शताब्दी में हुई और बैंक ऑफ बॉम्बे  तथा बाद में बैंक ऑफ हिंदुस्तान  जैसे संस्थान सामने आए। इसकी चर्चा हम सबसे पहले लेख बैंकिंग में कर चुके है ।

स्वतंत्रता के बाद बैंकिंग व्यवस्था को अधिक लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया गया। 1969 में प्रमुख बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद कृषि, छोटे व्यवसाय और कमजोर वर्गों को ऋण देने पर विशेष जोर बढ़ा। Priority Sector Lending की व्यवस्था इसी विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी। 

 हमने यहां से लोन के  इतिहास को  समझने का प्रयास किया , आइए अब आज के आधुनिक लोन सिस्टम के बारे में समझने  की तरफ बढ़ते है ।


यानी लोन की मूल अवधारणा हजारों वर्ष पुरानी है, लेकिन आज का बैंक लोन  उसी पुरानी उधार व्यवस्था का आधुनिक और अधिक व्यवस्थित रूप है। आज कई प्रकार के लोन है  उपलब्ध है , जिनमें से बहुत सारे नाम आप जानते है , आइए अब एक  आसान उदाहरण से इसे समझने का प्रयास करते है ।

मान लीजिए आपको ₹5 लाख की जरूरत है, लेकिन आपके पास ₹2 लाख हैं और आपको 3 लाख और चाहिए , आप अपने बैंक के पास गए  । आपका  बैंक आपको ₹3 लाख का लोन  देता है। अब आपको बैंक के ₹3 लाख को ब्याज के साथ तय अवधि में किस्तों (EMI) के माध्यम से वापस करना होगा।

लोन  के मुख्य हिस्से इस प्रकार है :-

1. Principal (मूलधन) – बैंक से लिया गया वास्तविक पैसा। 3 लाख जो बैंक ने आपको दिया ।

2. Interest (ब्याज) – बैंक द्वारा पैसे देने के बदले लिया जाने वाला शुल्क। मान लीजिए बैंक ने आपको 10 %  साल के दर से लोन दिया है  और fixed है । ब्याज दर दो तरह का होता है fixed और  floating , एक जिसमें ब्याज दर जो शुरू में होता है , वो हमेशा रहता है उसे FIXED कहते है ,  और जो ब्याज दर बदलता रहता है , RBI जब रेट बदल दे उसे floating कहते है , इनकी विस्तार से चर्चा आगे करेंगे ।

3. Tenure (अवधि) – Loan चुकाने का समय। अवधि आपको 5 साल दी गई है ।

4. EMI – हर महीने चुकाई जाने वाली निश्चित किस्त। आपकी हर महीने की EMI 6374.11 /- जो कि 60 महीने के लिए है ।

5. Security/Collateral – कुछ Loans में बैंक के पास रखी जाने वाली संपत्ति/गारंटी। इसमें नहीं है क्योंकि यह पर्सनल लोन है ।

6. Credit Score/CIBIL – लोन मिलने और ब्याज दर तय होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सिबिल कैसे काम करता है जानने के लिए cibil लेख अवश्य पढ़ ले ।

इस लोन पर आप सब मिलाकर मूलधन और ब्याज आप 5 साल में  300000/- ब्याज  82446.77 /- दोनों मिलकर 382446.77/-   5 साल में  हर महीने में 6374.11/- बैंक को देना होगा । इसे ही लोन कहते है । इसमें जो आपने मुख्य हिस्से है , वो लगभग सभी लोन में वही रहते है । 

अब आइए समझते है कि हम लोन को  कुछ मुख्य प्रकार में किस प्रकार विभाजित कर सकते है :- 

Retail Loan (रिटेल लोन):  

व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए दिए जाने वाले ऋण, जैसे होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन और एजुकेशन लोन इत्यादि । जब आप अपने जरूरतों को पूरा करने के लिए जैसे कि घर खरीदने के लिए , गाड़ी खरीदने के लिए , या किसी और जरूरत के लिए पर्सनल लोन लेते है , पढ़ाई के लिए लोन ये सभी लोन को बैंक में रिटेल लोन कहते है । आगे हम एक एक की चर्चा विस्तार से करेंगे ।

 Agriculture Loan (कृषि लोन): 

खेती, फसल उत्पादन, बागवानी (जैसे अनार की खेती) और कृषि उपकरणों के लिए किसानों को दिए जाने वाले ऋण। खेती के लिए लिए जाने वाले सभी लोन कृषि लोन अंतर्गत आते है  जैसे कि KCC (किसान क्रेडिट कार्ड), Agriculture Term loan , खेती की जमीन खरीदने के लिए लोन  या कोई भी कृषि से जुड़ी योजना के लिए लोन । इनकी चर्चा हम आगे विस्तार से करेंगे ।

 MSME Loan (एमएसएमई लोन):

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों, जैसे छोटी फैक्ट्रियों, दुकानों और सेवा प्रदाताओं को व्यवसाय के संचालन और विस्तार के लिए मिलने वाले ऋण।  बिजनेस से जुड़ा कोई लोन आप लेते है ,  जैसे कि मुद्रा लोन , Msme Term Loan , PM विश्वकर्मा loan  , PMEGP, CMEGP आदि , इनकी चर्चा भी हम आगे करेंगे ।

 Corporate / Wholesale Loan (कॉर्पोरेट लोन):

 बड़ी कंपनियों और औद्योगिक घरानों को बड़े पैमाने पर दिए जाने वाले व्यावसायिक ऋण। बड़े लोन जो कंपनियों को बिजनेस के लिए दिए जाते है  PVT Ltd , Public LTD कम्पनियों के लिए ।

Secured & Unsecured Loan (सुरक्षित और असुरक्षित ऋण): 

संपत्ति (जैसे जमीन, मकान या सोना) गिरवी रखकर मिलने वाले ऋण और बिना किसी गारंटी के साख के आधार पर मिलने वाले ऋण। मतलब जी लोन में कोई collateral नहीं होता, कोई अलग से सिक्योरिटी नहीं होता - जैसे कि जब आप कोई MSME लोन लेते है तो आपसे अलग से मतलब जो आप लोन लेकर खरीदना चाहते है , कोई मशीन या कुछ और , तो इस प्रकार के लोन को secured लोन , यानी collateral सिक्योरिटी के साथ । जिस लोन ने कोई collateral नहीं होता  जैसे कि MUDRA लोन  इसे Unsecured लोन कहते है ।

Short-term & Long-term Loan (अल्पकालिक और दीर्घकालिक ऋण): 

अल्पकालिक ऋण (Short-term Loan) आम तौर पर 1 वर्ष (12 महीने) या उससे कम समय की अवधि के लिए होते हैं। जो लोन ज्यादा से ज्यादा  1 साल के लिए दिया जाते है उसे शॉर्ट टर्म लोन कहते है , उससे ज्यादा अवधि के सभी लोन को long  टर्म लोन कहते है । 

हालांकि, बैंकिंग नियमों और ऋण के प्रकार के आधार पर कुछ शॉर्ट-term लोन कुछ हफ्तों से लेकर अधिकतम 12 से 18 महीनों तक के लिए भी दिए जा सकते हैं।

ध्यान रखे cc जो कि एक साल में renew होती है वो इसमें नहीं आती । 

लोन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :-

1. कभी भी आप लोन लेने के पहले अपने बैंक से सभी जानकारी जैसे कि लोन कितन है , कितने समय के लिए है , ब्याज कितना है  , कौन सा लोन है , ब्याज  fix है या Floating इत्यादि  जानकारी ।

2. आपके लोन का sanction letter जरूर  बैंक से एक कॉपी प्राप्त कर के  ,जब बैंक से आप लोन लेते है ,  बैंक आप से  सभी लोन के document साइन करा लेते है । Sanction के टर्म्स एंड कंडीशन  , sign करने से पहले अच्छे से समझ ले।

3. अगर आप चाहते है कि आपका फाइनेंस अच्छा चलता रहे तो , आप अपने CIBIL  की हेल्थ  हमेशा अच्छी रखे , कभी भी कोई लोन overdue न होने दे , क्योंकि आज के समय में लोन के लिए CIBIL से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है ।

इस लेख में हमने लोन के बारे में अच्छे से  समझने के प्रयास किया , हमने लोन से पहले की जरूरी  बहुत सारे विषयों की पर चर्चा कि ।

जितने भी प्रकार के लोन होते है इनमें से किसी न किसी प्रकार में आ जाते हैं , यह लोन पर पहला लेख है , आगे के लेखों  हम धीरे धीरे  इनमें से एक एक प्रकार को विस्तार से समझेंगे । मैं आशा करता हु कि यह लेख आपको पसंद आया होगा ।

यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।

धन्यवाद ।


CIBIL कैसे काम करता है ?


Credit Information Bureau (India) Limited

Cibil Score
Cibil score 


CIBIL भारत में क्रेडिट इतिहास और क्रेडिट स्कोर से जुड़ी सबसे प्रमुख संस्थाओं में से एक है। CIBIL का फुल फॉर्म Credit Information Bureau (India) Limited होता है ।आम भाषा में जब कोई व्यक्ति कहता है कि “मेरा CIBIL कितना है?”, तो वह सामान्यतः अपने Credit Score की बात कर रहा होता है। जब आप  बैंक में लोन लेने जाते है , बैंक का सबसे पहला सवाल होता है आपका cibil कितना है ? आप में  से बहुत सारे लोग सिबिल के बारे में जानते होगे या कम से कम सुना होगा कि cibil होता है , जिसे बैंक  देखकर आपको लोन देता है , किसी का cibil खराब है तो बैंक उसको लोन नहीं देता , जैसे शरीर के लिए आपका स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए , वैसे लोन  लेने के लिए आपका cibil अच्छा होना आवश्यक है । पिछले लेखों में हमने डिपॉजिट की बारे में कई बाते समझी , अब हम धीरे धीरे इस निवेश यात्रा में लोन की तरफ  बढेंगे, उसमें सबसे पहले आता है cibil , आइए अब हम इसे विस्तार से समझने का प्रयास करते है ।

Cibil के आने से पहले लोन देने के लिए ऐसी कोई व्यस्था नहीं थी , जिससे यह जाना जा सके  कि किसी ने कितना लोन ले रखा है , उस समय  जिस बैंक को लोन देना होता था वह प्रत्येक बैंक से पूछता था , कि क्या इस  व्यक्ति का कोई लोन है , आपके बैंक में  , आइए पहले इसे समझने का प्रयास करते है कि cibil की जरूरत क्यों पड़ी ?

क्या आप  जानते है ?

सिबिल (CIBIL) और अन्य क्रेडिट ब्यूरो की स्थापना से पहले भारत में बैंकिंग और लोन देने की पूरी व्यवस्था आज की तुलना में बिल्कुल अलग और काफी हद तक व्यक्तिगत रिश्तों और पारंपरिक कागजी जांच पर निर्भर थी।

उस समय लोन  देने का आधार मुख्य रूप से बैंक मैनेजर या स्थानीय स्तर पर उधार देने वाले व्यक्ति के साथ ग्राहक के संबंध और उसकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा होती थी। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में लोग एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानते थे, जिसके आधार पर कर्ज पास किया जाता था।

पहले सभी लोन लेने के लिए गारंटर अनिवार्य होता था , जिस पर  बैंक को भरोसा हो  वैसे गारंटर लिए जाते थे ।  लोन न चुकाए जाने के जोखिम को कम करने के लिए बैंक हमेशा मजबूत गारंटर या संपत्ति को गिरवी (Collateral) रखवाने पर जोर देते थे। बिना ठोस गारंटी या सिक्योरिटी के लोन मिलना बहुत मुश्किल होता था।

 उस समय देश के विभिन्न बैंकों के बीच ग्राहकों के लेन-देन का डेटा साझा करने का कोई केंद्रीय तंत्र (Centralized System) नहीं था। यदि किसी व्यक्ति ने एक बैंक से लोन लिया है और वह उसे बिना चुकाए दूसरे बैंक में नया लोन के लिए आवेदन कर दे, तो नए बैंक को पुराने लोन और डिफॉल्ट की कोई जानकारी नहीं मिल पाती थी। इस लिए बैंक उस समय  No Dues Certificate (NDC/NOC) – पुराने बैंक/संस्था से प्रमाण लेते थे , की उस व्यक्ति  का  कोई बकाया ऋण नहीं है। अपने आस पास के बैंक से इस तरह पता लग जाता था  अगर कोई लोन लिया गया  हो।

लेकिन इस में समस्या थी कि अगर कोई बाहर का हो , या किसी दूसरे  शहर से लोन लिया हों, तो पता नहीं चलता था , और लोन बाद में NPA (Non performing asset) इस शब्द की चर्चा बाद में करेंगे अभी बस इतना समझ लीजिए कि लोन खराब हो जाता था , या वह व्यक्ति पैसा नहीं भरता था। और वह व्यक्ति किसी और शहर में जाकर फिर लोन ले लेता था ।

पारदर्शिता की इस कमी के कारण लोग आसानी से कई बैंकों से कर्ज ले लेते थे और चुकाते नहीं थे। इस वजह से बैंकों के गैर-निष्पादित संपत्तियां (NPAs) बहुत ज्यादा बढ़ जाती थीं, जिससे बैंकिंग प्रणाली पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता था। यही से आवश्यकता महसूस हु एक डेटा सेंटर जहां सभी लोन का डेटा मिल सके और बैंक उस डेटा का इस्तेमाल लोन देने के लिए कर सके । यही से भारत में CIBIL की शुरुआत हुई ।


Cibil  का इतिहास 

CIBIL जैसा आधुनिक क्रेडिट इन्फॉर्मेशन सिस्टम  बहुत बाद में आया, लेकिन इसकी जड़ें 1841 में अमेरिका तक जाती हैं। Lewis Tappan ने New York में Mercantile Agency शुरू की, जिसका उद्देश्य व्यापारियों को दूसरे व्यापारियों की आर्थिक/क्रेडिट विश्वसनीयता की जानकारी देना था। इसे शुरुआती सफल क्रेडिट रिपोर्टिंग एजेंसी  में माना जाता है।

धीरे-धीरे व्यापारियों और कंपनियों के बारे में क्रेडिट रिपोर्ट  और रेटिंग  तैयार होने लगे। 1851 में John M. Bradstreet की कंपनी ने commercial credit rating book प्रकाशित किया। बाद में R.G. Dun और Bradstreet की कंपनियाँ 1933 में मिलकर Dun & Bradstreet बनीं। 

डन एंड ब्रैडस्ट्रीट (Dun & Bradstreet - D&B) दुनिया की सबसे पुरानी और प्रमुख कमर्शियल डेटा, एनालिटिक्स और बिजनेस इनसाइट्स प्रदान करने वाली कंपनियों में से एक है। यह व्यवसायों (Businesses) को वित्तीय जोखिम, क्रेडिट योग्यता (Creditworthiness) और सप्लाई चेन से जुड़े फैसले लेने में मदद करती है।

इस कंपनी ने 1963 में DUNS Number (Data Universal Numbering System) की शुरुआत की थी। यह 9 अंकों का एक ऐसा यूनिक कोड होता है, जिससे दुनिया भर की कंपनियों की पहचान और उनके वित्तीय रिकॉर्ड को ट्रैक किया जाता है। वैश्विक व्यापार और सरकारी ठेकों के लिए यह एक मानक पहचान माना जाता है।

व्यक्तिगत लोगों के क्रेडिट रिकॉर्ड  रखने वाली consumer credit bureaus विशेष रूप से 1870s के बाद अमेरिका में विकसित हुई ।

भारत में CIBIL (Credit Information Bureau (India) Limited) की स्थापना अगस्त 2000 में RBI की पहल और N. H. Siddiqui Committee की सिफारिशों के आधार पर हुई।  इसका मूल नाम क्रेडिट इंफॉर्मेशन ब्यूरो (इंडिया) लिमिटेड (Credit Information Bureau (India) Limited) है।

इसकी शुरुआत भारतीय स्टेट बैंक (SBI), एचडीएफसी (HDFC) और दो प्रमुख वैश्विक क्रेडिट ब्यूरो- ट्रांसयूनियन (TransUnion) और डन एंड ब्रेडस्ट्रीट (Dun & Bradstreet) के बीच एक साझेदारी के रूप में हुई थी।

शुरुआत के कुछ सालों तक यह सामान्य कंपनियों की तरह काम करता था, लेकिन देश में क्रेडिट डेटा सुरक्षा और इसके कामकाज को कानूनी जामा पहनाने के लिए भारत सरकार और रिजर्व बैंक (RBI) की पहल पर क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनीज (रेगुलेशन) एक्ट, 2005 पारित किया गया। इसके बाद इसे औपचारिक रूप से आरबीआई द्वारा विनियमित (Regulate) किया जाने लगा। कुछ मुख्य पड़ाव इस प्रकार है ।

2004: Consumer credit bureau services शुरू

2006: Commercial bureau शुरू

2007: भारत का पहला generic CIBIL Score शुरू

2011: आम लोगों को अपना CIBIL Score/Report उपलब्ध हुआ। 

साल 2016 में वैश्विक स्तर पर क्रेडिट सूचना का कारोबार करने वाली दिग्गज कंपनी ट्रांसयूनियन (TransUnion) ने इसमें अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई और इसका पूर्ण नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।

इसके बाद इसका आधिकारिक नाम बदलकर ट्रांसयूनियन सिबिल लिमिटेड (TransUnion CIBIL Limited) कर दिया गया, हालांकि आम बोलचाल की भाषा में यह आज भी केवल 'सिबिल' के नाम से ही प्रसिद्ध है।

सिबिल (CIBIL) का इतिहास भारत के वित्तीय और बैंकिंग सेक्टर में कर्ज देने की प्रक्रिया को पारदर्शी और सुरक्षित बनाने की एक महत्वपूर्ण कहानी है। और आज भी कंपनी का नाम TransUnion CIBIL Limited है।

CIBIL का मुख्य काम क्या है ?

CIBIL (Credit Information Bureau (India) Limited) का मुख्य काम किसी व्यक्ति या कंपनी के क्रेडिट इतिहास (Credit History) और क्रेडिट स्कोर (Credit Score) को रिकॉर्ड करना और उसका प्रबंधन करना है। यह भारत की पहली क्रेडिट इनफॉरमेशन कंपनी है, जो देश के नागरिकों का वित्तीय डेटा सुरक्षित रखती है। आप जिस भी बैंक से लोन लेते है , वह बैंक आपके लोन का डेटा cibil को भेजता है ।

डेटा का संकलन

यह देश के सभी बैंकों, एनबीएफसी (NBFCs) और वित्तीय संस्थानों से ग्राहकों के ऋण और पुनर्भुगतान से जुड़ा डेटा नियमित रूप से एकत्र करता है। 

आज के समय में  RBI के नियम के अनुसार बैंक/NBFC को CIBIL जैसी Credit Information Company को डेटा हर 15 दिन में (fortnightly) भेजना होता है। यह व्यवस्था 1 जनवरी 2025 से लागू है। पहले इसके भेजने का समय 30-45 दिन था ।

अब हर महीने के 15 तारीख को loan account की स्थिति cibil को बैंकों द्वारा रिपोर्ट की जाती है।

महीने के आखिरी दिन दूसरी रिपोर्टिंग की जाती  है। मतलब अब महीने में दो बार आपके लोन खाते की स्थिति cibil को रिपोर्ट की जाती है ।

बैंक को संबंधित रिपोर्टिंग की तारीख के 7 दिन  के भीतर डेटा CIBIL को भेजना होता है।

CIBIL को डेटा मिलने के बाद उसे अपने सिस्टम में 5 दिन  के भीतर  अपडेट  करना होता है।

मतलब अब आपका cibil हर 15 दिन में अपडेट होता है । इसलिए ध्यान रखे कि किसी भी लोन खाते में कोई overdue न हो , नहीं तो सिबिल स्कोर कम हो सकता है ।

क्रेडिट रिपोर्ट (CIR) बनाना: 

सभी बैंकों से डेटा एकत्रित करने के बाद यह एक विस्तृत रिपोर्ट होती है जिसमें व्यक्ति के सभी पुराने और वर्तमान लोन, क्रेडिट कार्ड, भुगतान का इतिहास (समय पर भुगतान किया या नहीं) और बकाया राशि का पूरा ब्योरा होता है। आपके कितने लोन है , किसका कितना बैलेंस है , रेगुलर है कि नहीं आदि  ब्यावरा होता  है ।

बैंकों और वित्तीय संस्थानों की मदद करना 

जब कोई व्यक्ति लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन करता है, तो बैंक उसकी साख (Creditworthiness) जांचने के लिए CIBIL से उसकी क्रेडिट रिपोर्ट मांगते हैं। जब आप बैंक में लाइन के लिए एप्लाई करते है , तब बैंक सबसे पहले आपकी Cibil  निकालता है , ताकि जान सके आपका स्कोर क्या है , और क्या आपने उससे पहले वाले सभी लोन टाइम पर भरे है । यह सब जानकारी उसे CIBIL से प्राप्त होती है ।

क्रेडिट स्कोर तैयार करना: 

यह लोन और क्रेडिट कार्ड के पिछले भुगतानों के आधार पर 300 से 900 के बीच का सिबिल स्कोर (CIBIL Score) कैलकुलेट करता है। स्कोर जितना अधिक होता है, वित्तीय संस्थानों की नजर में व्यक्ति की साख उतनी ही बेहतर मानी जाती है।


CIBIL  कैसे काम करता है ?

हमने ऊपर बहुत खुश cibil के बारे में जानकारी प्राप्त की , की वह क्या क्या  करता है , आइए अब हम विस्तार से जानने का प्रयास करेंगे कि cibil कैसे काम करता है ।

1. व्यक्ति बैंक से वित्तीय सुविधा लेता है , मतलब जब किसी बैंक से आप कोई लोन या क्रेडिट कार्ड लेते है 
जैसे कि :

  • Credit Card
  • Personal Loan
  • Home Loan
  • Car Loan
  • Over draft 
  • Consumer Loan आदि।

2. बैंक/वित्तीय संस्था ग्राहक का डेटा रिकॉर्ड करती है
इसमें सामान्यतः ग्राहक की पहचान, खाते/क्रेडिट सुविधा और भुगतान से जुड़ी जानकारी शामिल होती है। बैंक के पास आपके लोन से जुड़ी  सभी जानकारी  होती  ही है ।

3. बैंक यह जानकारी Credit Information Company को रिपोर्ट करता है
भारत में TransUnion CIBIL ऐसी प्रमुख Credit Information Companies में से एक है। बैंक और अन्य credit institutions अपने ग्राहकों के credit accounts और repayment behaviour की जानकारी रिपोर्ट करते हैं। हम पहले ही जान चुके है बैंक आपके लोन से संबंधित जानकारी महीने में दो बार cibil को भेजता है जैसे कि लोन कितना बचा है , EMI रेगुलर है कि नहीं ? कब लोन लिया  गया आदि।

4. CIBIL उस जानकारी को अपने रिकॉर्ड में अपडेट करता है
CIBIL उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति का ₹5 लाख का होम लोन  लिया है, तो रिपोर्ट में loan account, outstanding amount, repayment history आदि जैसी जानकारी दिखाई दे सकती है। बैंकों से भेजी हुई जानकारी Cibil द्वारा अपने डेटाबेस में अपडेट कर दी जाती है ।

भुगतान का रिकॉर्ड लगातार बनता रहता है

मान लीजिए EMI हर महीने ₹15,000 है:

महीना भुगतान CIBIL रिकॉर्ड पर प्रभाव
जनवरी समय पर अच्छा repayment record
फरवरी समय पर अच्छा
मार्च समय पर अच्छा
अप्रैल देर से देर से भुगतान रिपोर्ट हो सकता है

हर महीने की बैंक द्वारा दी गई जानकारी वहां अपडेट होती रहती है , आपके रिकॉर्ड में मेंटेन की जाती है ।

5. CIBIL इन क्रेडिट रिकॉर्ड  से Credit Report तैयार करता है

Credit Report में व्यक्ति के लोन अकाउंट  और repayment history जैसी जानकारी दिखाई जाती है। CIBIL  रिपोर्ट में आपकी बहुत सारी जानकारी दिखाई जाती है , यह रिपोर्ट CIBIL द्वारा तैयार की जाती है ।

7. इसी डेटा के आधार पर CIBIL Score तैयार होता है
CIBIL Score आम तौर पर 300 से 900 के बीच होता है। Score जितना अच्छा होता है, सामान्यतः व्यक्ति की creditworthiness उतनी बेहतर मानी जाती है। कभी कभी स्कोर में -1/ 0 होता है , इसका मतलब आपने अभी तक कोई लोन नहीं लिया है , आपकी कोई क्रेडिट हिस्ट्री नहीं है ।

8. जब व्यक्ति नया Loan/Credit Card मांगता है
जब आप अपने बैंक में जाकर कोई लोन या क्रेडिट कार्ड मांगते है  तो बैंक सबसे पहले cibil की वेबसाइट पर लॉगिन कर के , आपका नाम, आधार कार्ड नंबर, मोबाइल नंबर , एड्रेस डालकर आपका सिबिल  score / cibil रिपोर्ट निकालता है , जिससे बैंक को पता चलता है कि  , आपकी  क्रेडिट History अच्छी है कि नहीं , मतलब आपने लोन टाइम पर चुकाया है कि नहीं ।बैंक या लोन देने वाला  ग्राहक की अनुमति/प्रक्रिया के अनुसार उसकी क्रेडिट रिपोर्ट  और स्कोर  प्राप्त करके आपके लोन एप्लीकेशन  का मूल्यांकन कर सकता है।

लोन देने के लिए और भी बहुत कुछ देखना होता है  जैसे कि आपकी सैलरी या इनकम कितनी है , आपको कौन सा लोन चाहिए  ? बैंक के नियम क्या है , आपके पहले के  कौन कौन से लोन चल रहे है , जिसके लिए लोन जैसे कि गाड़ी या घर उसकी कितनी कीमत है आदि , देखकर फैसला किया जाता है कि लोन देना है या नहीं ।

9. Loan लेने के बाद प्रक्रिया फिर शुरू हो जाती है
नया लोन  → बैंक में repayment → बैंक द्वारा सिबिल को जानकारी भेजना → CIBIL द्वारा  रिकॉर्ड अपडेट करना → भविष्य में फिर आपका क्रेडिट स्कोर तय करना ।

कुछ महत्वपूर्ण जानकारी 

 1.CIBIL खुद लोन पास  या रिजेक्ट  नहीं करता। Cibil सिर्फ़ आपकी  क्रेडिट  history बैंक को देता है , यह निर्णय लेने के लिए  कि व्यक्ति को लोन देना है कि नहीं ।

2 .आपका क्रेडिट स्कोर अगर अच्छा है , तो यह मतलब नहीं कि आपको लोन मिल ही जाएगा , लोन देने के लिए जैसा कि हमने ऊपर देखा कि  बहुत कुछ देखकर  लोन दिया  जाता है ।

3. आप हमेशा अपना EMI टाइम पर भरे , ताकि आपका क्रेडिट score अच्छा रहे ,  OTS ( One time settlement )  करने से हमेशा बचे , क्योंकि यह आपका cibil हमेशा के लिए खराब कर देता है , और  भविष्य में आपको कोई बैंक लोन नहीं देगा ।

4.  आप अपना हर महीने का EMI  समय पर भरे , क्योंकि है जैसा कि हम समझ चुके है कि  महीने में २ बार आपका क्रेडिट की जानकारी बैंकों द्वारा cibil को भेजी जाती है , इसलिए हमेशा ध्यान रखे आपका  लोन एक रुपए भी overdue  न रहे ।


आप ने इस लेख में cibil से जुड़ी , बहुत सी महत्वपूर्ण  जानकारी के बारे में चर्चा की , cibil के बारे बहुत कुछ समझना बाकी है , लेकिन यह लेख बहुत बड़ा हो गया , इस लिए अब आगे की जानकारी अगले लेख में ।  मैं आशा करता हु कि , मेरा यह लेख  आपके बैंकिंग और फाइनेंस से जुड़ी यात्रा में सहयोगी होगा , यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।

धन्यवाद।