CIBIL कैसे काम करता है ?


Credit Information Bureau (India) Limited

Cibil Score
Cibil score 


CIBIL भारत में क्रेडिट इतिहास और क्रेडिट स्कोर से जुड़ी सबसे प्रमुख संस्थाओं में से एक है। CIBIL का फुल फॉर्म Credit Information Bureau (India) Limited होता है ।आम भाषा में जब कोई व्यक्ति कहता है कि “मेरा CIBIL कितना है?”, तो वह सामान्यतः अपने Credit Score की बात कर रहा होता है। जब आप  बैंक में लोन लेने जाते है , बैंक का सबसे पहला सवाल होता है आपका cibil कितना है ? आप में  से बहुत सारे लोग सिबिल के बारे में जानते होगे या कम से कम सुना होगा कि cibil होता है , जिसे बैंक  देखकर आपको लोन देता है , किसी का cibil खराब है तो बैंक उसको लोन नहीं देता , जैसे शरीर के लिए आपका स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए , वैसे लोन  लेने के लिए आपका cibil अच्छा होना आवश्यक है । पिछले लेखों में हमने डिपॉजिट की बारे में कई बाते समझी , अब हम धीरे धीरे इस निवेश यात्रा में लोन की तरफ  बढेंगे, उसमें सबसे पहले आता है cibil , आइए अब हम इसे विस्तार से समझने का प्रयास करते है ।

Cibil के आने से पहले लोन देने के लिए ऐसी कोई व्यस्था नहीं थी , जिससे यह जाना जा सके  कि किसी ने कितना लोन ले रखा है , उस समय  जिस बैंक को लोन देना होता था वह प्रत्येक बैंक से पूछता था , कि क्या इस  व्यक्ति का कोई लोन है , आपके बैंक में  , आइए पहले इसे समझने का प्रयास करते है कि cibil की जरूरत क्यों पड़ी ?

क्या आप  जानते है ?

सिबिल (CIBIL) और अन्य क्रेडिट ब्यूरो की स्थापना से पहले भारत में बैंकिंग और लोन देने की पूरी व्यवस्था आज की तुलना में बिल्कुल अलग और काफी हद तक व्यक्तिगत रिश्तों और पारंपरिक कागजी जांच पर निर्भर थी।

उस समय लोन  देने का आधार मुख्य रूप से बैंक मैनेजर या स्थानीय स्तर पर उधार देने वाले व्यक्ति के साथ ग्राहक के संबंध और उसकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा होती थी। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में लोग एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानते थे, जिसके आधार पर कर्ज पास किया जाता था।

पहले सभी लोन लेने के लिए गारंटर अनिवार्य होता था , जिस पर  बैंक को भरोसा हो  वैसे गारंटर लिए जाते थे ।  लोन न चुकाए जाने के जोखिम को कम करने के लिए बैंक हमेशा मजबूत गारंटर या संपत्ति को गिरवी (Collateral) रखवाने पर जोर देते थे। बिना ठोस गारंटी या सिक्योरिटी के लोन मिलना बहुत मुश्किल होता था।

 उस समय देश के विभिन्न बैंकों के बीच ग्राहकों के लेन-देन का डेटा साझा करने का कोई केंद्रीय तंत्र (Centralized System) नहीं था। यदि किसी व्यक्ति ने एक बैंक से लोन लिया है और वह उसे बिना चुकाए दूसरे बैंक में नया लोन के लिए आवेदन कर दे, तो नए बैंक को पुराने लोन और डिफॉल्ट की कोई जानकारी नहीं मिल पाती थी। इस लिए बैंक उस समय  No Dues Certificate (NDC/NOC) – पुराने बैंक/संस्था से प्रमाण लेते थे , की उस व्यक्ति  का  कोई बकाया ऋण नहीं है। अपने आस पास के बैंक से इस तरह पता लग जाता था  अगर कोई लोन लिया गया  हो।

लेकिन इस में समस्या थी कि अगर कोई बाहर का हो , या किसी दूसरे  शहर से लोन लिया हों, तो पता नहीं चलता था , और लोन बाद में NPA (Non performing asset) इस शब्द की चर्चा बाद में करेंगे अभी बस इतना समझ लीजिए कि लोन खराब हो जाता था , या वह व्यक्ति पैसा नहीं भरता था। और वह व्यक्ति किसी और शहर में जाकर फिर लोन ले लेता था ।

पारदर्शिता की इस कमी के कारण लोग आसानी से कई बैंकों से कर्ज ले लेते थे और चुकाते नहीं थे। इस वजह से बैंकों के गैर-निष्पादित संपत्तियां (NPAs) बहुत ज्यादा बढ़ जाती थीं, जिससे बैंकिंग प्रणाली पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता था। यही से आवश्यकता महसूस हु एक डेटा सेंटर जहां सभी लोन का डेटा मिल सके और बैंक उस डेटा का इस्तेमाल लोन देने के लिए कर सके । यही से भारत में CIBIL की शुरुआत हुई ।


Cibil  का इतिहास 

CIBIL जैसा आधुनिक क्रेडिट इन्फॉर्मेशन सिस्टम  बहुत बाद में आया, लेकिन इसकी जड़ें 1841 में अमेरिका तक जाती हैं। Lewis Tappan ने New York में Mercantile Agency शुरू की, जिसका उद्देश्य व्यापारियों को दूसरे व्यापारियों की आर्थिक/क्रेडिट विश्वसनीयता की जानकारी देना था। इसे शुरुआती सफल क्रेडिट रिपोर्टिंग एजेंसी  में माना जाता है।

धीरे-धीरे व्यापारियों और कंपनियों के बारे में क्रेडिट रिपोर्ट  और रेटिंग  तैयार होने लगे। 1851 में John M. Bradstreet की कंपनी ने commercial credit rating book प्रकाशित किया। बाद में R.G. Dun और Bradstreet की कंपनियाँ 1933 में मिलकर Dun & Bradstreet बनीं। 

डन एंड ब्रैडस्ट्रीट (Dun & Bradstreet - D&B) दुनिया की सबसे पुरानी और प्रमुख कमर्शियल डेटा, एनालिटिक्स और बिजनेस इनसाइट्स प्रदान करने वाली कंपनियों में से एक है। यह व्यवसायों (Businesses) को वित्तीय जोखिम, क्रेडिट योग्यता (Creditworthiness) और सप्लाई चेन से जुड़े फैसले लेने में मदद करती है।

इस कंपनी ने 1963 में DUNS Number (Data Universal Numbering System) की शुरुआत की थी। यह 9 अंकों का एक ऐसा यूनिक कोड होता है, जिससे दुनिया भर की कंपनियों की पहचान और उनके वित्तीय रिकॉर्ड को ट्रैक किया जाता है। वैश्विक व्यापार और सरकारी ठेकों के लिए यह एक मानक पहचान माना जाता है।

व्यक्तिगत लोगों के क्रेडिट रिकॉर्ड  रखने वाली consumer credit bureaus विशेष रूप से 1870s के बाद अमेरिका में विकसित हुई ।

भारत में CIBIL (Credit Information Bureau (India) Limited) की स्थापना अगस्त 2000 में RBI की पहल और N. H. Siddiqui Committee की सिफारिशों के आधार पर हुई।  इसका मूल नाम क्रेडिट इंफॉर्मेशन ब्यूरो (इंडिया) लिमिटेड (Credit Information Bureau (India) Limited) है।

इसकी शुरुआत भारतीय स्टेट बैंक (SBI), एचडीएफसी (HDFC) और दो प्रमुख वैश्विक क्रेडिट ब्यूरो- ट्रांसयूनियन (TransUnion) और डन एंड ब्रेडस्ट्रीट (Dun & Bradstreet) के बीच एक साझेदारी के रूप में हुई थी।

शुरुआत के कुछ सालों तक यह सामान्य कंपनियों की तरह काम करता था, लेकिन देश में क्रेडिट डेटा सुरक्षा और इसके कामकाज को कानूनी जामा पहनाने के लिए भारत सरकार और रिजर्व बैंक (RBI) की पहल पर क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनीज (रेगुलेशन) एक्ट, 2005 पारित किया गया। इसके बाद इसे औपचारिक रूप से आरबीआई द्वारा विनियमित (Regulate) किया जाने लगा। कुछ मुख्य पड़ाव इस प्रकार है ।

2004: Consumer credit bureau services शुरू

2006: Commercial bureau शुरू

2007: भारत का पहला generic CIBIL Score शुरू

2011: आम लोगों को अपना CIBIL Score/Report उपलब्ध हुआ। 

साल 2016 में वैश्विक स्तर पर क्रेडिट सूचना का कारोबार करने वाली दिग्गज कंपनी ट्रांसयूनियन (TransUnion) ने इसमें अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई और इसका पूर्ण नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।

इसके बाद इसका आधिकारिक नाम बदलकर ट्रांसयूनियन सिबिल लिमिटेड (TransUnion CIBIL Limited) कर दिया गया, हालांकि आम बोलचाल की भाषा में यह आज भी केवल 'सिबिल' के नाम से ही प्रसिद्ध है।

सिबिल (CIBIL) का इतिहास भारत के वित्तीय और बैंकिंग सेक्टर में कर्ज देने की प्रक्रिया को पारदर्शी और सुरक्षित बनाने की एक महत्वपूर्ण कहानी है। और आज भी कंपनी का नाम TransUnion CIBIL Limited है।

CIBIL का मुख्य काम क्या है ?

CIBIL (Credit Information Bureau (India) Limited) का मुख्य काम किसी व्यक्ति या कंपनी के क्रेडिट इतिहास (Credit History) और क्रेडिट स्कोर (Credit Score) को रिकॉर्ड करना और उसका प्रबंधन करना है। यह भारत की पहली क्रेडिट इनफॉरमेशन कंपनी है, जो देश के नागरिकों का वित्तीय डेटा सुरक्षित रखती है। आप जिस भी बैंक से लोन लेते है , वह बैंक आपके लोन का डेटा cibil को भेजता है ।

डेटा का संकलन

यह देश के सभी बैंकों, एनबीएफसी (NBFCs) और वित्तीय संस्थानों से ग्राहकों के ऋण और पुनर्भुगतान से जुड़ा डेटा नियमित रूप से एकत्र करता है। 

आज के समय में  RBI के नियम के अनुसार बैंक/NBFC को CIBIL जैसी Credit Information Company को डेटा हर 15 दिन में (fortnightly) भेजना होता है। यह व्यवस्था 1 जनवरी 2025 से लागू है। पहले इसके भेजने का समय 30-45 दिन था ।

अब हर महीने के 15 तारीख को loan account की स्थिति cibil को बैंकों द्वारा रिपोर्ट की जाती है।

महीने के आखिरी दिन दूसरी रिपोर्टिंग की जाती  है। मतलब अब महीने में दो बार आपके लोन खाते की स्थिति cibil को रिपोर्ट की जाती है ।

बैंक को संबंधित रिपोर्टिंग की तारीख के 7 दिन  के भीतर डेटा CIBIL को भेजना होता है।

CIBIL को डेटा मिलने के बाद उसे अपने सिस्टम में 5 दिन  के भीतर  अपडेट  करना होता है।

मतलब अब आपका cibil हर 15 दिन में अपडेट होता है । इसलिए ध्यान रखे कि किसी भी लोन खाते में कोई overdue न हो , नहीं तो सिबिल स्कोर कम हो सकता है ।

क्रेडिट रिपोर्ट (CIR) बनाना: 

सभी बैंकों से डेटा एकत्रित करने के बाद यह एक विस्तृत रिपोर्ट होती है जिसमें व्यक्ति के सभी पुराने और वर्तमान लोन, क्रेडिट कार्ड, भुगतान का इतिहास (समय पर भुगतान किया या नहीं) और बकाया राशि का पूरा ब्योरा होता है। आपके कितने लोन है , किसका कितना बैलेंस है , रेगुलर है कि नहीं आदि  ब्यावरा होता  है ।

बैंकों और वित्तीय संस्थानों की मदद करना 

जब कोई व्यक्ति लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन करता है, तो बैंक उसकी साख (Creditworthiness) जांचने के लिए CIBIL से उसकी क्रेडिट रिपोर्ट मांगते हैं। जब आप बैंक में लाइन के लिए एप्लाई करते है , तब बैंक सबसे पहले आपकी Cibil  निकालता है , ताकि जान सके आपका स्कोर क्या है , और क्या आपने उससे पहले वाले सभी लोन टाइम पर भरे है । यह सब जानकारी उसे CIBIL से प्राप्त होती है ।

क्रेडिट स्कोर तैयार करना: 

यह लोन और क्रेडिट कार्ड के पिछले भुगतानों के आधार पर 300 से 900 के बीच का सिबिल स्कोर (CIBIL Score) कैलकुलेट करता है। स्कोर जितना अधिक होता है, वित्तीय संस्थानों की नजर में व्यक्ति की साख उतनी ही बेहतर मानी जाती है।


CIBIL  कैसे काम करता है ?

हमने ऊपर बहुत खुश cibil के बारे में जानकारी प्राप्त की , की वह क्या क्या  करता है , आइए अब हम विस्तार से जानने का प्रयास करेंगे कि cibil कैसे काम करता है ।

1. व्यक्ति बैंक से वित्तीय सुविधा लेता है , मतलब जब किसी बैंक से आप कोई लोन या क्रेडिट कार्ड लेते है 
जैसे कि :

  • Credit Card
  • Personal Loan
  • Home Loan
  • Car Loan
  • Over draft 
  • Consumer Loan आदि।

2. बैंक/वित्तीय संस्था ग्राहक का डेटा रिकॉर्ड करती है
इसमें सामान्यतः ग्राहक की पहचान, खाते/क्रेडिट सुविधा और भुगतान से जुड़ी जानकारी शामिल होती है। बैंक के पास आपके लोन से जुड़ी  सभी जानकारी  होती  ही है ।

3. बैंक यह जानकारी Credit Information Company को रिपोर्ट करता है
भारत में TransUnion CIBIL ऐसी प्रमुख Credit Information Companies में से एक है। बैंक और अन्य credit institutions अपने ग्राहकों के credit accounts और repayment behaviour की जानकारी रिपोर्ट करते हैं। हम पहले ही जान चुके है बैंक आपके लोन से संबंधित जानकारी महीने में दो बार cibil को भेजता है जैसे कि लोन कितना बचा है , EMI रेगुलर है कि नहीं ? कब लोन लिया  गया आदि।

4. CIBIL उस जानकारी को अपने रिकॉर्ड में अपडेट करता है
CIBIL उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति का ₹5 लाख का होम लोन  लिया है, तो रिपोर्ट में loan account, outstanding amount, repayment history आदि जैसी जानकारी दिखाई दे सकती है। बैंकों से भेजी हुई जानकारी Cibil द्वारा अपने डेटाबेस में अपडेट कर दी जाती है ।

भुगतान का रिकॉर्ड लगातार बनता रहता है

मान लीजिए EMI हर महीने ₹15,000 है:

महीना भुगतान CIBIL रिकॉर्ड पर प्रभाव
जनवरी समय पर अच्छा repayment record
फरवरी समय पर अच्छा
मार्च समय पर अच्छा
अप्रैल देर से देर से भुगतान रिपोर्ट हो सकता है

हर महीने की बैंक द्वारा दी गई जानकारी वहां अपडेट होती रहती है , आपके रिकॉर्ड में मेंटेन की जाती है ।

5. CIBIL इन क्रेडिट रिकॉर्ड  से Credit Report तैयार करता है

Credit Report में व्यक्ति के लोन अकाउंट  और repayment history जैसी जानकारी दिखाई जाती है। CIBIL  रिपोर्ट में आपकी बहुत सारी जानकारी दिखाई जाती है , यह रिपोर्ट CIBIL द्वारा तैयार की जाती है ।

7. इसी डेटा के आधार पर CIBIL Score तैयार होता है
CIBIL Score आम तौर पर 300 से 900 के बीच होता है। Score जितना अच्छा होता है, सामान्यतः व्यक्ति की creditworthiness उतनी बेहतर मानी जाती है। कभी कभी स्कोर में -1/ 0 होता है , इसका मतलब आपने अभी तक कोई लोन नहीं लिया है , आपकी कोई क्रेडिट हिस्ट्री नहीं है ।

8. जब व्यक्ति नया Loan/Credit Card मांगता है
जब आप अपने बैंक में जाकर कोई लोन या क्रेडिट कार्ड मांगते है  तो बैंक सबसे पहले cibil की वेबसाइट पर लॉगिन कर के , आपका नाम, आधार कार्ड नंबर, मोबाइल नंबर , एड्रेस डालकर आपका सिबिल  score / cibil रिपोर्ट निकालता है , जिससे बैंक को पता चलता है कि  , आपकी  क्रेडिट History अच्छी है कि नहीं , मतलब आपने लोन टाइम पर चुकाया है कि नहीं ।बैंक या लोन देने वाला  ग्राहक की अनुमति/प्रक्रिया के अनुसार उसकी क्रेडिट रिपोर्ट  और स्कोर  प्राप्त करके आपके लोन एप्लीकेशन  का मूल्यांकन कर सकता है।

लोन देने के लिए और भी बहुत कुछ देखना होता है  जैसे कि आपकी सैलरी या इनकम कितनी है , आपको कौन सा लोन चाहिए  ? बैंक के नियम क्या है , आपके पहले के  कौन कौन से लोन चल रहे है , जिसके लिए लोन जैसे कि गाड़ी या घर उसकी कितनी कीमत है आदि , देखकर फैसला किया जाता है कि लोन देना है या नहीं ।

9. Loan लेने के बाद प्रक्रिया फिर शुरू हो जाती है
नया लोन  → बैंक में repayment → बैंक द्वारा सिबिल को जानकारी भेजना → CIBIL द्वारा  रिकॉर्ड अपडेट करना → भविष्य में फिर आपका क्रेडिट स्कोर तय करना ।

कुछ महत्वपूर्ण जानकारी 

 1.CIBIL खुद लोन पास  या रिजेक्ट  नहीं करता। Cibil सिर्फ़ आपकी  क्रेडिट  history बैंक को देता है , यह निर्णय लेने के लिए  कि व्यक्ति को लोन देना है कि नहीं ।

2 .आपका क्रेडिट स्कोर अगर अच्छा है , तो यह मतलब नहीं कि आपको लोन मिल ही जाएगा , लोन देने के लिए जैसा कि हमने ऊपर देखा कि  बहुत कुछ देखकर  लोन दिया  जाता है ।

3. आप हमेशा अपना EMI टाइम पर भरे , ताकि आपका क्रेडिट score अच्छा रहे ,  OTS ( One time settlement )  करने से हमेशा बचे , क्योंकि यह आपका cibil हमेशा के लिए खराब कर देता है , और  भविष्य में आपको कोई बैंक लोन नहीं देगा ।

4.  आप अपना हर महीने का EMI  समय पर भरे , क्योंकि है जैसा कि हम समझ चुके है कि  महीने में २ बार आपका क्रेडिट की जानकारी बैंकों द्वारा cibil को भेजी जाती है , इसलिए हमेशा ध्यान रखे आपका  लोन एक रुपए भी overdue  न रहे ।


आप ने इस लेख में cibil से जुड़ी , बहुत सी महत्वपूर्ण  जानकारी के बारे में चर्चा की , cibil के बारे बहुत कुछ समझना बाकी है , लेकिन यह लेख बहुत बड़ा हो गया , इस लिए अब आगे की जानकारी अगले लेख में ।  मैं आशा करता हु कि , मेरा यह लेख  आपके बैंकिंग और फाइनेंस से जुड़ी यात्रा में सहयोगी होगा , यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।

धन्यवाद।



(SCSS)सीनियर सिटीज़न सेविंग स्कीम

सीनियर सिटीज़न सेविंग स्कीम (SCSS): वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षित निवेश और शानदार रिटर्न


SCSS benefits
Benefits of SCSS


सीनियर सिटीज़न सेविंग स्कीम (SCSS) भारत सरकार की एक बेहद लोकप्रिय और सुरक्षित छोटी बचत योजना है, जो विशेष रूप से सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) और वरिष्ठ नागरिकों के लिए बनाई गई है। आज के समय में कहा जाए कि सरकारी बैंक FD  पर कितना इंटरेस्ट देते है , तो आप कहेंगे कि ज्यादा से ज्यादा 7% , पर उसके विपरीत सिर्फ SCSS  ही एक एडी स्कीम है जो सबसे ज्यादा ब्याज  देती  8.20%  इंटरेस्ट  देता है , इस तरह यह सबसे ज्यादा ब्याज देने वाली  SCHEME  कह सकते है । यह भारत सरकार द्वारा मुख्य रूप से ६० साल के ऊपर के लोगों के लिए  बनाया गया है , ताकि आप  रिटायर होने के बाद अपना पैसा सुरक्षित , और ज्यादा ब्याज के साथ रख सके । पिछले लेखों में हमने FD , RD, और  PPF के बारे में विस्तार से जाना , PPF भी  एक सरकारी योजना है सबके लिए । अगर आप  इनके   बारे में पढ़ना चाहते है तो यहां PPF , FDR, RD पर  CLICK  कर के पढ़ सकते है , उसके बाद आप SCSS को भी अच्छे से समझ पाएंगे ।  आइए अब हम इसे और अच्छे तरीके से समझने का प्रयास करते है ।

क्या आप जानते है ?

SCSS के आने से पहले बुजुर्गों के लिए 'Senior Citizens Deposit Scheme, 1993' जैसी कुछ अन्य योजनाएं थीं। सरकार ने पुरानी व्यवस्थाओं को और अधिक आकर्षक, सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए इस नई और उन्नत योजना को पेश किया।

Senior Citizen Savings Scheme (SCSS) की शुरुआत भारत सरकार द्वारा वर्ष 2004 में की गई थी। 2004 में इसे लाया गया था ।

इस योजना को शुरू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य देश के वरिष्ठ नागरिकों (Senior Citizens) को रिटायरमेंट के बाद एक सुरक्षित, निश्चित और नियमित आय (Regular Income) का स्रोत प्रदान करना था।

इसे भारत सरकार के पोस्ट ऑफिस सेविंग्स नेटवर्क (India Post) और अधिकृत कमर्शियल बैंकों के माध्यम से लॉन्च किया गया था, ताकि देश के बुजुर्ग आसानी से इसका लाभ उठा सकें।

 सबसे पहले  अगर आप रिटायरमेंट के बाद किसी से  , पूछते है कि पैसा कहा इन्वेस्ट करना  है  ? तो , यह जवाब अवश्य आता है कि SCSS , इस योजना के  बहुत सारे फायदे है , और यह वरिष्ठ नागरिकों में  बहुत लोकप्रिय है , अब हम  इस योजना से जुड़ी मुख्य  बातों पर चर्चा करेंगे :

ब्याज  कितना मिलेगा ?

सबसे पहला  सवाल होता है , ब्याज कितना है ? वर्तमान  मतलब अगस्त , 2026 में इस योजना पर 8.2% प्रति वर्ष की दर से ब्याज मिल रहा है, जिसकी समीक्षा सरकार द्वारा हर तिमाही (Quarterly)  या हर तीन महीने में की जाती है। एक बार खाता खुलने पर यह ब्याज दर पूरे कार्यकाल (5 साल) के लिए लॉक हो जाती है। मतलब अगर बीच में बदल भी जाए तो आपका ब्याज दर 8.20 % ही रहेगा 5 साल तक ।

क्या आप जानते है ?

अगस्त 2004 में जब योजना शुरू हुई, तब से लेकर मार्च 2012 तक ब्याज दर 9.0% पर स्थिर रही थी ।

2012-13: 9.30%

2013-2015: 9.20%

2015-2016: बढ़ाकर फिर से 9.3% कर दी गई थी ।

सरकार ने तिमाही समीक्षा के आधार पर दरों में धीरे-धीरे कटौती करना शुरू किया। वर्ष 2016 से 2019 के बीच यह दर घटकर 8.3% से 8.7% के बीच रही।

इसके बाद वर्ष 2020 की शुरुआत में यह घटकर 8.6% और फिर कोविड काल के दौरान गिरकर सीधे 7.4% पर आ गई 

ब्याज दरों में सुधार हुआ और यह बढ़कर 7.4% से 7.6% और फिर 8.0% तक पहुँची ।

अप्रैल 2023 से यह दर स्थिर रूप से 8.2% पर बनी हुई है और वर्तमान तिमाही में भी यही लागू है।

अधिकतम ब्याज दर  9.30%  और न्यूनतम ब्याज दर 7.40 %  तक गई  है । इससे आप जान सकते है कि समय के साथ उतार - चढ़ाव  समय समय पर होता रहता है , लेकिन एक बार आप जिस समय SCSS में पैसा जमा करते है , वही ब्याज 5 साल तक रहता है ?

ब्याज  कैसे मिलेगा  ?

इसका ब्याज हर तिमाही (हर 3 महीने में - अप्रैल, जुलाई, अक्टूबर और जनवरी के पहले दिन) सीधे निवेशक के बैंक खाते में जमा किया जाता है। इसका ब्याज आप  अपने बचत खाता में ले सकते है । इसमें एक बात ध्यान रखे , मान लीजिए आप ने खाता 1  मार्च को   खोला तो , आपका पहला  ब्याज  अप्रैल में जमा होगा 1 तारीख को , लेकिन वो ३ महीने का नहीं बल्कि 1 महीने का होगा  क्योंकि आपने SCSS  में पैसा  ब्याज मिलने की तारीख से एक महीने पहले खोला है ,ब्याज मिलने का महीने और तारीख का समय हमेशा एक ही रहता है ,  उसके बाद फिर अगला जुलाई में और 3-3 महीने पर जमा होता रहेगा  । मतलब आप जब भी पैसा जमा करते है , तो सबसे पहले ब्याज आपको अप्रैल, जुलाई, अक्टूबर और जनवरी के 1 तारीख को मिलेगा , आपने जब खाता खोला उसके आधार पर , उसके बाद हर 3 महीने में मिलता रहेगा |

कितने दिन के लिए जमा  होता है ?

इस योजना का मैच्योरिटी पीरियड 5 वर्ष है। इसे पूरा होने के बाद एक बार में केवल 3 साल के लिए और बढ़ाया जा सकता है। ५ साल का term period होता है , उसके बाद केवल एक बार ३ साल के लिए बढ़ा सकते है  फिर मैच्योर हो जाता है।, लेकिन फिर से आप ५ साल के लिए नया कर सकते है । मतलब कम से कम 5 साल तक रखा जा सकता है |

कितना जमा कर सकते है ?

 न्यूनतम निवेश: ₹1,000

 अधिकतम निवेश: ₹30 लाख (व्यक्तिगत या संयुक्त खाते में)

पहले इसमें  1500000/-  ही जमा किए जा सकते थे , अब बढ़ाकर  3000000/ कर दिया गया है , संयुक्त मतलब अलग अलग बैंक के  मिलाकर टोटल  रकम 3000000/- से ज्यादा नहीं हो सकती । आपके पास अगर  1000/- भी है तो आप SCSS  में जमा कर सकते है | एक बात ध्यान  रखने की है कि अलग अलग बैंक , मतलब आप दो अलग  अलग बैंकों में 1500000/- और 1500000/- रख सकते है |

कौन SCSS   खाता खोल  सकता है ?

कोई भी  60 वर्ष या उससे अधिक आयु का  भारतीय नागरिक। 

55 से 60 वर्ष की आयु के वे कर्मचारी जो वीआरएस (VRS) या सुपरएनुएशन ले चुके हैं (बशर्ते रिटायरमेंट लाभ मिलने के 1 महीने के भीतर खाता खोला गया हो)। आपको रिटायरमेंट का डॉक्यूमेंट बैंक में दिखाना होता है और आपके रिटायरमेंट के एक महीने के भीतर ये खाता अवश्य खोल ले |

रक्षा सेवा (Defense) से रिटायर होने वाले कर्मचारियों के लिए आयु सीमा 50 वर्ष है। यहां भी आपको डॉक्यूमेंट दिखाना होता है , तब बैंक आपका SCSS चालू कर देता है । रिटायर होने के तुरंत बाद अवश्य SCSS में पैसा जमा कर दे, नहीं तो फिर 60 साल तक इंतजार करना पड़ेगा |

कौन SCSS नहीं कर सकता हैं ?

हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) और एनआरआई (NRI) इस योजना के पात्र नहीं हैं।

जिसकी आयु ६० साल से कम हो , वह SCSS में पैसा जमा नहीं कर सकता। 

क्या ज्वाइंट अकाउंट  खोला जा सकता है ?

हां, सीनियर सिटिजन सेविंग्स स्कीम (SCSS) के तहत ज्वॉइंट अकाउंट खोला जा सकता है, लेकिन इसके कुछ विशेष नियम हैं:
 1.  SCSS में आप केवल अपने   पति या पत्नी (Spouse)  के साथ ही ज्वॉइंट अकाउंट खोल सकते हैं। अन्य किसी रिश्तेदार या व्यक्ति के साथ ज्वॉइंट खाता खोलने की अनुमति नहीं है।
 2.   ज्वॉइंट अकाउंट में मुख्य या पहला नाम उसी व्यक्ति का होना चाहिए जो SCSS की पात्रता (जैसे 60 वर्ष या उससे अधिक की आयु, या तय नियमों के तहत सेवानिवृत्त कर्मचारी) को पूरा करता हो।
 3.  ज्वॉइंट खाते में जमा की जाने वाली पूरी राशि केवल  पहले खाताधारक   की ही मानी जाती है।
 4.  खाताधारक की आयु 60 वर्ष होने पर, यदि उनके जीवनसाथी की आयु 60 वर्ष से कम भी है, तब भी उन्हें ज्वॉइंट होल्डर बनाया जा सकता है।

कर लाभ (Tax Benefits):

इस योजना में आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत  सिर्फ ₹1.5 लाख तक के निवेश पर टैक्स छूट का लाभ मिलता है। मतलब आप इसमें कितना भी पैसा डाले 150000/- के ऊपर लेकिन आपको छूट सिर्फ 150000/-  तक ही मिलेगी उस साल में |

इस  पर मिलने वाला ब्याज पूरी तरह कर योग्य (Taxable) है,  जो भी ब्याज मिलेगा उसपर आपको टैक्स देना होगा | एक वित्तीय वर्ष में ब्याज ₹50,000 से अधिक होने पर टीडीएस (TDS) कट सकता है। मतलब अगर आप  600000/ के ऊपर पैसा जमा करते है तो TDS कटेगा। जिसे आप बाद में ITR भर कर वापस ले सकते है ।

समय से पहले निकासी (Premature Closure): 

अगर   आपने ५ साल के लिए रखा और उससे पहले ही आपको पैसे की जरूरत पड़ जाए और बंद करना पड़े तो क्या नियम है ?

खाता खोलने के 1 साल के भीतर बंद करने पर कोई ब्याज नहीं मिलता। अगर १ साल से पहले बंद किया जाए तो उसपर १ रुपए भी ब्याज नहीं मिलता है , इसलिए इसमें सोच समझ कर पैसा डाले जिसकी आपको ५ साल जरूरत नहीं पड़ेगी , वहीं  पैसा उसमें जमा करे । चुकी इस स्कीम पर  तिहामी ब्याज मिलता हैं , इसलिए जब आप जमा करते है ब्याज ३ महीने बाद मिलने लगता है , लेकिन जब आप एक साल से पहले बंद करने जाते है तो यह पैसा आपके मूलधन में से काट लिया जाता है , जो ब्याज आपको दिया गया है उतना । इस लिए  हमेशा अगर आपको 15  लाख जमा करना है तो , 3  SCSS बनाए ५०००००/ के , ताकि अगर कभी जरूरत पड़ जाए तो एक तोड़कर काम हो जाए ।

अगर 1 से 2 साल के बीच बंद करना पड़ा तो आपके   मूलधन  या जितनबा पैसा आपने जमा किया था , का 1.5% काट  लिया जाता है , आइए इस अच्छे से समझते है |  मान लीजिए आपने  1000000/ रखा है  और एक साल के बाद आपको तोड़ने की जरूरत पड़ गई तब  बैंक / पोस्ट ऑफिस   आपका जमा पैसे का  1.5% मतलब  15000/- काट   लेगा  ।

अगर आपको  2 से 5 साल के बीच बंद करना पड़ा तो   1% की कटौती (पेनल्टी) का प्रावधान है ।  अगर 2 साल पूरे हो गए तो 1 % मतलब  10 लाख का 10000/- काट लिया  जाएगा |

इसलिए हमेशा इसमें वही पैसा रखे जिसकी आपको   5 साल में जरूरत  नहीं पड़ेगी । 

क्या लोन मिलता है ?

SCSS पर कोई लोन नहीं ले  सकते आप , ध्यान रखे इसलिए इसमें वही पैसा रखे जिसकी जरूरत आपको ५ साल नहीं लगेगी , अगर  लोन  चाहिए तो आप बैंक FD कर सकते है , जिसपर आप कभी भी 90 % तक  लोन ले सकते है ।  अपना पैसा अलग अलग बाट कर जमा करे , थोड़ा FD, कुछ PPF और SSC , इससे आपको  जरूरत पड़ने पर दिक्कत नहीं होगी।

SCSS कहा खोला जा सकता है ?

आप देश के किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (Public Sector Bank) या चुनिंदा निजी बैंकों (Private Banks) में SCSS (Senior Citizen Savings Scheme)  खाता खुलवा सकते हैं। 
भारत के किसी भी पोस्ट ऑफिस या डाकघर में SCSS अकाउंट आसानी से खोला जा सकता है। आपका  जिस भी बैंक में अकाउंट हो  वहां आप  अकाउंट खोल सकते है |

सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम खोले के लिए क्या क्या आवश्यक है ?

सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम (SCSS) के तहत खाता खोलने के लिए निम्नलिखित दस्तावेजों और औपचारिकताओं की आवश्यकता होती है:
 1. SCSS खाता खोलने का फॉर्म (Account Opening Form)   बैंक या पोस्ट ऑफिस से मिलने वाला निर्धारित आवेदन फॉर्म।
 2. पहचान प्रमाण (Identity Proof):    पैन कार्ड, आधार कार्ड, वोटर आईडी, या पासपोर्ट में से कोई एक।
 3. पते का प्रमाण (Address Proof):   आधार कार्ड, बिजली बिल, राशन कार्ड, या पासपोर्ट।
 4. बआयु प्रमाण (Age Proof):  
  •  60 वर्ष या उससे अधिक आयु के सामान्य नागरिकों के लिए (आधार कार्ड, पैन कार्ड, या जन्म प्रमाण पत्र)।
  •   55 से 60 वर्ष की आयु वाले सेवानिवृत्त रक्षा कर्मचारियों (Defense Employees) के लिए रिटायरमेंट का प्रमाण और आयु प्रमाण।
  •  50 से 60 वर्ष की आयु वाले अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े दस्तावेज।
  •   पासपोर्ट साइज फोटोग्राफ: खाताधारकों की हाल ही में खींची गई तस्वीरें (ज्वॉइंट अकाउंट होने पर दोनों की)।
  •  पैन कार्ड (PAN Card)   निवेश और टीडीएस (TDS) उद्देश्यों के लिए अनिवार्य।
 5. आरंभिक राशि:    खाता खोलने के लिए न्यूनतम 1,000 रुपये या उससे अधिक की चेक/नकद राशि (निवेश अधिकतम 30 लाख रुपये तक हो सकता है)।

हमने SCSS ( सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम) के बारे में लगभग सभी विषयों पर चर्चा करने का प्रयास किया , अब एक बात  जान लेते है चार्ट के माध्यम से की  आप कितना पैसा रखेंगे 8.20 % रेट से तो 5 साल में कितना होता है , आइए देखते है |

SCSS interest chart
इस चार्ट में हम देख  सकते है कि , 5 साल में कितना  ब्याज quarterly और 5 साल में  जोड़कर  कितना होता है , इस से आप अंदाजा लगा सकते है , कि SCSS सीनियर  लोगो  के लिये  काफी अच्छा है , कुछ पैसा तो इसमें  जरूर  रखना चाहिए | इस लेख को पढ़ने के बाद  मैं आशा करता हु आप SCSS अच्छे से  समझने लगे होगे | इस लेख  को पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद |

धन्यवाद |