लोन क्या होता है ?

Loan (ऋण/कर्ज) 

Loan type
Loan Type


लोन  वह धनराशि है जो बैंक या वित्तीय संस्था किसी व्यक्ति, व्यवसाय या संस्था को जरूरत पूरी करने के लिए उधार देती है, जिसे ग्राहक को तय समय में ब्याज सहित वापस चुकाना होता है।  शायद ही आज के समय में ऐसा हो  जिसने लोन के बारे में नहीं सुना हो , क्रेडिट कार्ड से लेकर बड़े लोन , और यहां तक कि कितने ही ऐप आज लोन दे रहे है । आप में  से सब लोगों ने कोई न कोई लोन लिया ही होगा , आज हम लोन पर बात करेंगे ,उसके इतिहास से लेकर धीरे धीरे बाद में एक एक प्रकार के लोन पर विस्तार से चर्चा करेंगे , आप बैंक से एक निश्चित राशि प्राप्त करते है , और उस पर ब्याज पहले से तय होता है , और तय समय में आपको चुकाना होता है । हमने सबसे पहले लेख में बैंकिंग क्या होती है इसके बारे में जानकारी प्राप्त की थी , बैंक का सबसे मुख्य काम  Deposit लेना और लोन देना ही हैं । वहीं बैंकों के आय का सबसे मुख्य  स्त्रोत है । अगर आपने डिपॉजिट के बारे में नहीं पढ़ा तो अवश्य  FD, RD, PPF, चालू खाता और बचत खाता के बारे में पढ़ ले । आइए सबसे पहले हम इसके इतिहास से शुरू करते है ।

क्या आप जानते है ?

लोन यानी ऋण/कर्ज की शुरुआत आधुनिक बैंक बनने से बहुत पहले हो चुकी थी। जब लोगों को व्यापार, खेती या व्यक्तिगत जरूरतों के लिए तत्काल धन की आवश्यकता होती थी, तब वे दूसरे व्यक्ति या साहूकार से धन उधार लेते थे और बाद में उसे ब्याज सहित वापस करते थे।

लोन (ऋण) का इतिहास मानव सभ्यता के शुरुआती दौर से जुड़ा हुआ है, जब मुद्रा (करेंसी) का आविष्कार नहीं हुआ था और लेन-देन वस्तु विनिमय (बार्टर सिस्टम) पर आधारित था।

वस्तु विनिमय प्रणाली (बार्टर सिस्टम - लगभग 3000 ईसा पूर्व से पहले):

प्राचीन काल में लोग धन या सिक्कों के बजाय अनाज, मवेशी, औजार या अन्य जरूरी सामान उधार लेते और चुकाते थे। इसे दुनिया का सबसे पुराना रूप माना जाता है। एक सामान लेना और दूसरा देना ही  बार्टर   सिस्टम कहते है , आपने इतिहास पढ़ते समय अवश्य पढ़ा होगा ।

इतिहास  का पहला लिखित साक्ष्य मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) की प्राचीन सभ्यताओं से मिलता है। यहाँ मिट्टी की गोलियों (Clay Tablets) पर अनाज और चांदी के रूप में दिए जाने वाले ऋण और ब्याज दरों का हिसाब दर्ज किया जाता था।

प्राचीन यूनान और रोम (लगभग 500 ईसा पूर्व - 500 ईस्वी): इन सभ्यताओं में मंदिरों को सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता था, जहाँ लोग अपनी संपत्ति जमा करते थे और मंदिर के पुजारी व्यापारियों व जरूरतमंदों को ब्याज पर कर्ज देते थे। यहीं से औपचारिक बैंकिंग और ऋण प्रणाली की शुरुआत हुई।

मध्यकालीन यूरोप और साहूकार (5वीं से 15वीं शताब्दी): इस दौरान कैथोलिक चर्च द्वारा ब्याज लेना (जिसे सूदखोरी कहा जाता था) प्रतिबंधित था, जिससे यह व्यवसाय मुख्य रूप से यहूदी समुदायों और निजी साहूकारों के हाथ में चला गया।

आधुनिक बैंकिंग प्रणाली (17वीं शताब्दी के बाद): दुनिया का पहला केंद्रीय बैंक 'स्वीडिश रिक्सबैंक' 1668 में स्थापित हुआ और 1694 में 'बैंक ऑफ इंग्लैंड' की स्थापना हुई। इसके बाद कागजी मुद्रा, चेक और विधिवत लोन एग्रीमेंट की शुरुआत हुई।

भारत में वैदिक काल से ही साहूकार, महाजन और सेठ ऋण देने का काम करते थे।  आपने फिल्मों में देखा होगा साहूकार ने खेती रख कर ब्याज पर पैसा दिया और बाद में खेत वापस नहीं किया, लेकिन वहीं  साहूकारों ने प्रत्यक्ष रूप में लोन के शुरुआत की   ।ब्रिटिश काल में आधुनिक बैंकिंग की नींव पड़ी ।

प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय व्यापार में जब औपचारिक कंपनियाँ नहीं थीं, तब व्यापारी और राजघराने 'तपशील', 'ऋण-पत्र' या 'तौवीज़' जैसे लिखित दस्तावेजों के जरिए कर्ज का लेन-देन करते थे। हमारा देश भारत पहले से ही  समृद्ध रहा है जहां से सभी देश व्यापार करते थे और बदले ने सोना देते थे ।

उस दौर में हुंडी एक प्रकार का अल्पकालिक ऋण और विनिमय पत्र था, लेकिन बड़े व्यापारिक उपक्रमों और रियासतों को दीर्घकालिक कर्ज देने के लिए राजाओं या साहूकारों द्वारा मुहरबंद लिखित अनुबंध जारी किए जाते थे, जिन्हें आधुनिक ऋण पत्र का शुरुआती रूप माना जा सकता है।

भारत में आधुनिक अर्थों में ऋण पत्रों (Debentures) की शुरुआत ब्रिटिश शासनकाल के दौरान, विशेषकर 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई जब देश में रेलवे, प्लांटेशन, कपड़ा मिलें और कोयला खदानें स्थापित हो रही थीं ।

डिबेंचर्स (Debentures) एक प्रकार का कर्ज पत्र या प्रतिभूत (Instrument) होते हैं, जिनका उपयोग कंपनियाँ या सरकारें जनता से ऋण (Loan) जुटाने के लिए करती हैं। जब कोई कंपनी बैंक से लोन लेने के बजाय सीधे आम जनता या निवेशकों से पैसा उधार लेना चाहती है, तो वह डिबेंचर्स जारी करती है। डिबेंचर खरीदने वाला व्यक्ति कंपनी का शेयरधारक (Shareholder) नहीं बनता, बल्कि कंपनी का लेनदार (Creditor) बन जाता है। आज के समय में ये मार्केट भारत में 54 से 56 लाख करोड़ का है ।

इन बड़े उद्योगों को स्थापित करने के लिए भारी-भरकम पूंजी (Capital) की आवश्यकता थी, जिसे अकेले बैंकों से जुटाना संभव नहीं था। तब कंपनियों ने आम जनता और संस्थागत निवेशकों से सीधे कर्ज लेने के लिए 'कंपनी अधिनियम' (Companies Act) के तहत ऋण पत्र जारी करना शुरू किया।

 भारत में कंपनी अधिनियम, 1866 और बाद के संशोधनों (जैसे 1913 और 1956 का अधिनियम) ने ऋण पत्रों को कानूनी मान्यता और सुरक्षा प्रदान की, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा।

बैंकिंग प्रणाली के साथ संबंध

ऐतिहासिक रूप से वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks) कंपनियों को दिए जाने वाले ऋण के बदले उनकी संपत्तियों के साथ-साथ ऋण पत्रों को गिरवी या सुरक्षित साधन के रूप में स्वीकार करते थे।

चुकी  शुरुआती दौर में निवेशक एक अनजान कंपनी को पैसा देने से डरते थे, इसलिए बैंकिंग और वित्तीय इतिहास में 'डिबेंचर ट्रस्टी' की अवधारणा आई। एक बैंक या वित्तीय संस्थान ट्रस्टी के रूप में काम करता था ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कंपनी निवेशकों के हितों और संपत्तियों की सुरक्षा कर रही है।

समय के साथ, पारंपरिक ऋण पत्रों का स्थान गैर-परिवर्तनीय ऋण पत्रों (NCDs) और सरकारी बॉन्ड ने ले लिया।

भारतीय पूंजी बाजार में 1980 और 1990 के दशक के बाद इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (IDBI), आईसीआईसीआई (ICICI) और अन्य वित्तीय संस्थानों ने उद्योगों के विकास के लिए बड़े पैमाने पर डिबेंचर बाजार को बढ़ावा दिया।

आज के दौर में ऋण पत्र केवल एक कर्ज का कागज नहीं रह गए हैं, बल्कि यह भारतीय शेयर बाजार (NSE/BSE) और ऋण बाजार (Debt Market) का एक मुख्य स्तंभ हैं, जिनके जरिए कंपनियाँ  बैंकों पर निर्भर हुए बिना सीधे जनता से दीर्घकालिक पूंजी जुटाती हैं।

RBI के इतिहास संबंधी दस्तावेज के अनुसार भारत में आधुनिक प्रकार की कमर्शियल बैंकिंग  की शुरुआत 18वीं शताब्दी में हुई और बैंक ऑफ बॉम्बे  तथा बाद में बैंक ऑफ हिंदुस्तान  जैसे संस्थान सामने आए। इसकी चर्चा हम सबसे पहले लेख बैंकिंग में कर चुके है ।

स्वतंत्रता के बाद बैंकिंग व्यवस्था को अधिक लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया गया। 1969 में प्रमुख बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद कृषि, छोटे व्यवसाय और कमजोर वर्गों को ऋण देने पर विशेष जोर बढ़ा। Priority Sector Lending की व्यवस्था इसी विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी। 

 हमने यहां से लोन के  इतिहास को  समझने का प्रयास किया , आइए अब आज के आधुनिक लोन सिस्टम के बारे में समझने  की तरफ बढ़ते है ।


यानी लोन की मूल अवधारणा हजारों वर्ष पुरानी है, लेकिन आज का बैंक लोन  उसी पुरानी उधार व्यवस्था का आधुनिक और अधिक व्यवस्थित रूप है। आज कई प्रकार के लोन है  उपलब्ध है , जिनमें से बहुत सारे नाम आप जानते है , आइए अब एक  आसान उदाहरण से इसे समझने का प्रयास करते है ।

मान लीजिए आपको ₹5 लाख की जरूरत है, लेकिन आपके पास ₹2 लाख हैं और आपको 3 लाख और चाहिए , आप अपने बैंक के पास गए  । आपका  बैंक आपको ₹3 लाख का लोन  देता है। अब आपको बैंक के ₹3 लाख को ब्याज के साथ तय अवधि में किस्तों (EMI) के माध्यम से वापस करना होगा।

लोन  के मुख्य हिस्से इस प्रकार है :-

1. Principal (मूलधन) – बैंक से लिया गया वास्तविक पैसा। 3 लाख जो बैंक ने आपको दिया ।

2. Interest (ब्याज) – बैंक द्वारा पैसे देने के बदले लिया जाने वाला शुल्क। मान लीजिए बैंक ने आपको 10 %  साल के दर से लोन दिया है  और fixed है । ब्याज दर दो तरह का होता है fixed और  floating , एक जिसमें ब्याज दर जो शुरू में होता है , वो हमेशा रहता है उसे FIXED कहते है ,  और जो ब्याज दर बदलता रहता है , RBI जब रेट बदल दे उसे floating कहते है , इनकी विस्तार से चर्चा आगे करेंगे ।

3. Tenure (अवधि) – Loan चुकाने का समय। अवधि आपको 5 साल दी गई है ।

4. EMI – हर महीने चुकाई जाने वाली निश्चित किस्त। आपकी हर महीने की EMI 6374.11 /- जो कि 60 महीने के लिए है ।

5. Security/Collateral – कुछ Loans में बैंक के पास रखी जाने वाली संपत्ति/गारंटी। इसमें नहीं है क्योंकि यह पर्सनल लोन है ।

6. Credit Score/CIBIL – लोन मिलने और ब्याज दर तय होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सिबिल कैसे काम करता है जानने के लिए cibil लेख अवश्य पढ़ ले ।

इस लोन पर आप सब मिलाकर मूलधन और ब्याज आप 5 साल में  300000/- ब्याज  82446.77 /- दोनों मिलकर 382446.77/-   5 साल में  हर महीने में 6374.11/- बैंक को देना होगा । इसे ही लोन कहते है । इसमें जो आपने मुख्य हिस्से है , वो लगभग सभी लोन में वही रहते है । 

अब आइए समझते है कि हम लोन को  कुछ मुख्य प्रकार में किस प्रकार विभाजित कर सकते है :- 

Retail Loan (रिटेल लोन):  

व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए दिए जाने वाले ऋण, जैसे होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन और एजुकेशन लोन इत्यादि । जब आप अपने जरूरतों को पूरा करने के लिए जैसे कि घर खरीदने के लिए , गाड़ी खरीदने के लिए , या किसी और जरूरत के लिए पर्सनल लोन लेते है , पढ़ाई के लिए लोन ये सभी लोन को बैंक में रिटेल लोन कहते है । आगे हम एक एक की चर्चा विस्तार से करेंगे ।

 Agriculture Loan (कृषि लोन): 

खेती, फसल उत्पादन, बागवानी (जैसे अनार की खेती) और कृषि उपकरणों के लिए किसानों को दिए जाने वाले ऋण। खेती के लिए लिए जाने वाले सभी लोन कृषि लोन अंतर्गत आते है  जैसे कि KCC (किसान क्रेडिट कार्ड), Agriculture Term loan , खेती की जमीन खरीदने के लिए लोन  या कोई भी कृषि से जुड़ी योजना के लिए लोन । इनकी चर्चा हम आगे विस्तार से करेंगे ।

 MSME Loan (एमएसएमई लोन):

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों, जैसे छोटी फैक्ट्रियों, दुकानों और सेवा प्रदाताओं को व्यवसाय के संचालन और विस्तार के लिए मिलने वाले ऋण।  बिजनेस से जुड़ा कोई लोन आप लेते है ,  जैसे कि मुद्रा लोन , Msme Term Loan , PM विश्वकर्मा loan  , PMEGP, CMEGP आदि , इनकी चर्चा भी हम आगे करेंगे ।

 Corporate / Wholesale Loan (कॉर्पोरेट लोन):

 बड़ी कंपनियों और औद्योगिक घरानों को बड़े पैमाने पर दिए जाने वाले व्यावसायिक ऋण। बड़े लोन जो कंपनियों को बिजनेस के लिए दिए जाते है  PVT Ltd , Public LTD कम्पनियों के लिए ।

Secured & Unsecured Loan (सुरक्षित और असुरक्षित ऋण): 

संपत्ति (जैसे जमीन, मकान या सोना) गिरवी रखकर मिलने वाले ऋण और बिना किसी गारंटी के साख के आधार पर मिलने वाले ऋण। मतलब जी लोन में कोई collateral नहीं होता, कोई अलग से सिक्योरिटी नहीं होता - जैसे कि जब आप कोई MSME लोन लेते है तो आपसे अलग से मतलब जो आप लोन लेकर खरीदना चाहते है , कोई मशीन या कुछ और , तो इस प्रकार के लोन को secured लोन , यानी collateral सिक्योरिटी के साथ । जिस लोन ने कोई collateral नहीं होता  जैसे कि MUDRA लोन  इसे Unsecured लोन कहते है ।

Short-term & Long-term Loan (अल्पकालिक और दीर्घकालिक ऋण): 

अल्पकालिक ऋण (Short-term Loan) आम तौर पर 1 वर्ष (12 महीने) या उससे कम समय की अवधि के लिए होते हैं। जो लोन ज्यादा से ज्यादा  1 साल के लिए दिया जाते है उसे शॉर्ट टर्म लोन कहते है , उससे ज्यादा अवधि के सभी लोन को long  टर्म लोन कहते है । 

हालांकि, बैंकिंग नियमों और ऋण के प्रकार के आधार पर कुछ शॉर्ट-term लोन कुछ हफ्तों से लेकर अधिकतम 12 से 18 महीनों तक के लिए भी दिए जा सकते हैं।

ध्यान रखे cc जो कि एक साल में renew होती है वो इसमें नहीं आती । 

लोन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :-

1. कभी भी आप लोन लेने के पहले अपने बैंक से सभी जानकारी जैसे कि लोन कितन है , कितने समय के लिए है , ब्याज कितना है  , कौन सा लोन है , ब्याज  fix है या Floating इत्यादि  जानकारी ।

2. आपके लोन का sanction letter जरूर  बैंक से एक कॉपी प्राप्त कर के  ,जब बैंक से आप लोन लेते है ,  बैंक आप से  सभी लोन के document साइन करा लेते है । Sanction के टर्म्स एंड कंडीशन  , sign करने से पहले अच्छे से समझ ले।

3. अगर आप चाहते है कि आपका फाइनेंस अच्छा चलता रहे तो , आप अपने CIBIL  की हेल्थ  हमेशा अच्छी रखे , कभी भी कोई लोन overdue न होने दे , क्योंकि आज के समय में लोन के लिए CIBIL से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है ।

इस लेख में हमने लोन के बारे में अच्छे से  समझने के प्रयास किया , हमने लोन से पहले की जरूरी  बहुत सारे विषयों की पर चर्चा कि ।

जितने भी प्रकार के लोन होते है इनमें से किसी न किसी प्रकार में आ जाते हैं , यह लोन पर पहला लेख है , आगे के लेखों  हम धीरे धीरे  इनमें से एक एक प्रकार को विस्तार से समझेंगे । मैं आशा करता हु कि यह लेख आपको पसंद आया होगा ।

यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।

धन्यवाद ।


CIBIL कैसे काम करता है ?


Credit Information Bureau (India) Limited

Cibil Score
Cibil score 


CIBIL भारत में क्रेडिट इतिहास और क्रेडिट स्कोर से जुड़ी सबसे प्रमुख संस्थाओं में से एक है। CIBIL का फुल फॉर्म Credit Information Bureau (India) Limited होता है ।आम भाषा में जब कोई व्यक्ति कहता है कि “मेरा CIBIL कितना है?”, तो वह सामान्यतः अपने Credit Score की बात कर रहा होता है। जब आप  बैंक में लोन लेने जाते है , बैंक का सबसे पहला सवाल होता है आपका cibil कितना है ? आप में  से बहुत सारे लोग सिबिल के बारे में जानते होगे या कम से कम सुना होगा कि cibil होता है , जिसे बैंक  देखकर आपको लोन देता है , किसी का cibil खराब है तो बैंक उसको लोन नहीं देता , जैसे शरीर के लिए आपका स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए , वैसे लोन  लेने के लिए आपका cibil अच्छा होना आवश्यक है । पिछले लेखों में हमने डिपॉजिट की बारे में कई बाते समझी , अब हम धीरे धीरे इस निवेश यात्रा में लोन की तरफ  बढेंगे, उसमें सबसे पहले आता है cibil , आइए अब हम इसे विस्तार से समझने का प्रयास करते है ।

Cibil के आने से पहले लोन देने के लिए ऐसी कोई व्यस्था नहीं थी , जिससे यह जाना जा सके  कि किसी ने कितना लोन ले रखा है , उस समय  जिस बैंक को लोन देना होता था वह प्रत्येक बैंक से पूछता था , कि क्या इस  व्यक्ति का कोई लोन है , आपके बैंक में  , आइए पहले इसे समझने का प्रयास करते है कि cibil की जरूरत क्यों पड़ी ?

क्या आप  जानते है ?

सिबिल (CIBIL) और अन्य क्रेडिट ब्यूरो की स्थापना से पहले भारत में बैंकिंग और लोन देने की पूरी व्यवस्था आज की तुलना में बिल्कुल अलग और काफी हद तक व्यक्तिगत रिश्तों और पारंपरिक कागजी जांच पर निर्भर थी।

उस समय लोन  देने का आधार मुख्य रूप से बैंक मैनेजर या स्थानीय स्तर पर उधार देने वाले व्यक्ति के साथ ग्राहक के संबंध और उसकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा होती थी। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में लोग एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानते थे, जिसके आधार पर कर्ज पास किया जाता था।

पहले सभी लोन लेने के लिए गारंटर अनिवार्य होता था , जिस पर  बैंक को भरोसा हो  वैसे गारंटर लिए जाते थे ।  लोन न चुकाए जाने के जोखिम को कम करने के लिए बैंक हमेशा मजबूत गारंटर या संपत्ति को गिरवी (Collateral) रखवाने पर जोर देते थे। बिना ठोस गारंटी या सिक्योरिटी के लोन मिलना बहुत मुश्किल होता था।

 उस समय देश के विभिन्न बैंकों के बीच ग्राहकों के लेन-देन का डेटा साझा करने का कोई केंद्रीय तंत्र (Centralized System) नहीं था। यदि किसी व्यक्ति ने एक बैंक से लोन लिया है और वह उसे बिना चुकाए दूसरे बैंक में नया लोन के लिए आवेदन कर दे, तो नए बैंक को पुराने लोन और डिफॉल्ट की कोई जानकारी नहीं मिल पाती थी। इस लिए बैंक उस समय  No Dues Certificate (NDC/NOC) – पुराने बैंक/संस्था से प्रमाण लेते थे , की उस व्यक्ति  का  कोई बकाया ऋण नहीं है। अपने आस पास के बैंक से इस तरह पता लग जाता था  अगर कोई लोन लिया गया  हो।

लेकिन इस में समस्या थी कि अगर कोई बाहर का हो , या किसी दूसरे  शहर से लोन लिया हों, तो पता नहीं चलता था , और लोन बाद में NPA (Non performing asset) इस शब्द की चर्चा बाद में करेंगे अभी बस इतना समझ लीजिए कि लोन खराब हो जाता था , या वह व्यक्ति पैसा नहीं भरता था। और वह व्यक्ति किसी और शहर में जाकर फिर लोन ले लेता था ।

पारदर्शिता की इस कमी के कारण लोग आसानी से कई बैंकों से कर्ज ले लेते थे और चुकाते नहीं थे। इस वजह से बैंकों के गैर-निष्पादित संपत्तियां (NPAs) बहुत ज्यादा बढ़ जाती थीं, जिससे बैंकिंग प्रणाली पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता था। यही से आवश्यकता महसूस हु एक डेटा सेंटर जहां सभी लोन का डेटा मिल सके और बैंक उस डेटा का इस्तेमाल लोन देने के लिए कर सके । यही से भारत में CIBIL की शुरुआत हुई ।


Cibil  का इतिहास 

CIBIL जैसा आधुनिक क्रेडिट इन्फॉर्मेशन सिस्टम  बहुत बाद में आया, लेकिन इसकी जड़ें 1841 में अमेरिका तक जाती हैं। Lewis Tappan ने New York में Mercantile Agency शुरू की, जिसका उद्देश्य व्यापारियों को दूसरे व्यापारियों की आर्थिक/क्रेडिट विश्वसनीयता की जानकारी देना था। इसे शुरुआती सफल क्रेडिट रिपोर्टिंग एजेंसी  में माना जाता है।

धीरे-धीरे व्यापारियों और कंपनियों के बारे में क्रेडिट रिपोर्ट  और रेटिंग  तैयार होने लगे। 1851 में John M. Bradstreet की कंपनी ने commercial credit rating book प्रकाशित किया। बाद में R.G. Dun और Bradstreet की कंपनियाँ 1933 में मिलकर Dun & Bradstreet बनीं। 

डन एंड ब्रैडस्ट्रीट (Dun & Bradstreet - D&B) दुनिया की सबसे पुरानी और प्रमुख कमर्शियल डेटा, एनालिटिक्स और बिजनेस इनसाइट्स प्रदान करने वाली कंपनियों में से एक है। यह व्यवसायों (Businesses) को वित्तीय जोखिम, क्रेडिट योग्यता (Creditworthiness) और सप्लाई चेन से जुड़े फैसले लेने में मदद करती है।

इस कंपनी ने 1963 में DUNS Number (Data Universal Numbering System) की शुरुआत की थी। यह 9 अंकों का एक ऐसा यूनिक कोड होता है, जिससे दुनिया भर की कंपनियों की पहचान और उनके वित्तीय रिकॉर्ड को ट्रैक किया जाता है। वैश्विक व्यापार और सरकारी ठेकों के लिए यह एक मानक पहचान माना जाता है।

व्यक्तिगत लोगों के क्रेडिट रिकॉर्ड  रखने वाली consumer credit bureaus विशेष रूप से 1870s के बाद अमेरिका में विकसित हुई ।

भारत में CIBIL (Credit Information Bureau (India) Limited) की स्थापना अगस्त 2000 में RBI की पहल और N. H. Siddiqui Committee की सिफारिशों के आधार पर हुई।  इसका मूल नाम क्रेडिट इंफॉर्मेशन ब्यूरो (इंडिया) लिमिटेड (Credit Information Bureau (India) Limited) है।

इसकी शुरुआत भारतीय स्टेट बैंक (SBI), एचडीएफसी (HDFC) और दो प्रमुख वैश्विक क्रेडिट ब्यूरो- ट्रांसयूनियन (TransUnion) और डन एंड ब्रेडस्ट्रीट (Dun & Bradstreet) के बीच एक साझेदारी के रूप में हुई थी।

शुरुआत के कुछ सालों तक यह सामान्य कंपनियों की तरह काम करता था, लेकिन देश में क्रेडिट डेटा सुरक्षा और इसके कामकाज को कानूनी जामा पहनाने के लिए भारत सरकार और रिजर्व बैंक (RBI) की पहल पर क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनीज (रेगुलेशन) एक्ट, 2005 पारित किया गया। इसके बाद इसे औपचारिक रूप से आरबीआई द्वारा विनियमित (Regulate) किया जाने लगा। कुछ मुख्य पड़ाव इस प्रकार है ।

2004: Consumer credit bureau services शुरू

2006: Commercial bureau शुरू

2007: भारत का पहला generic CIBIL Score शुरू

2011: आम लोगों को अपना CIBIL Score/Report उपलब्ध हुआ। 

साल 2016 में वैश्विक स्तर पर क्रेडिट सूचना का कारोबार करने वाली दिग्गज कंपनी ट्रांसयूनियन (TransUnion) ने इसमें अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई और इसका पूर्ण नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।

इसके बाद इसका आधिकारिक नाम बदलकर ट्रांसयूनियन सिबिल लिमिटेड (TransUnion CIBIL Limited) कर दिया गया, हालांकि आम बोलचाल की भाषा में यह आज भी केवल 'सिबिल' के नाम से ही प्रसिद्ध है।

सिबिल (CIBIL) का इतिहास भारत के वित्तीय और बैंकिंग सेक्टर में कर्ज देने की प्रक्रिया को पारदर्शी और सुरक्षित बनाने की एक महत्वपूर्ण कहानी है। और आज भी कंपनी का नाम TransUnion CIBIL Limited है।

CIBIL का मुख्य काम क्या है ?

CIBIL (Credit Information Bureau (India) Limited) का मुख्य काम किसी व्यक्ति या कंपनी के क्रेडिट इतिहास (Credit History) और क्रेडिट स्कोर (Credit Score) को रिकॉर्ड करना और उसका प्रबंधन करना है। यह भारत की पहली क्रेडिट इनफॉरमेशन कंपनी है, जो देश के नागरिकों का वित्तीय डेटा सुरक्षित रखती है। आप जिस भी बैंक से लोन लेते है , वह बैंक आपके लोन का डेटा cibil को भेजता है ।

डेटा का संकलन

यह देश के सभी बैंकों, एनबीएफसी (NBFCs) और वित्तीय संस्थानों से ग्राहकों के ऋण और पुनर्भुगतान से जुड़ा डेटा नियमित रूप से एकत्र करता है। 

आज के समय में  RBI के नियम के अनुसार बैंक/NBFC को CIBIL जैसी Credit Information Company को डेटा हर 15 दिन में (fortnightly) भेजना होता है। यह व्यवस्था 1 जनवरी 2025 से लागू है। पहले इसके भेजने का समय 30-45 दिन था ।

अब हर महीने के 15 तारीख को loan account की स्थिति cibil को बैंकों द्वारा रिपोर्ट की जाती है।

महीने के आखिरी दिन दूसरी रिपोर्टिंग की जाती  है। मतलब अब महीने में दो बार आपके लोन खाते की स्थिति cibil को रिपोर्ट की जाती है ।

बैंक को संबंधित रिपोर्टिंग की तारीख के 7 दिन  के भीतर डेटा CIBIL को भेजना होता है।

CIBIL को डेटा मिलने के बाद उसे अपने सिस्टम में 5 दिन  के भीतर  अपडेट  करना होता है।

मतलब अब आपका cibil हर 15 दिन में अपडेट होता है । इसलिए ध्यान रखे कि किसी भी लोन खाते में कोई overdue न हो , नहीं तो सिबिल स्कोर कम हो सकता है ।

क्रेडिट रिपोर्ट (CIR) बनाना: 

सभी बैंकों से डेटा एकत्रित करने के बाद यह एक विस्तृत रिपोर्ट होती है जिसमें व्यक्ति के सभी पुराने और वर्तमान लोन, क्रेडिट कार्ड, भुगतान का इतिहास (समय पर भुगतान किया या नहीं) और बकाया राशि का पूरा ब्योरा होता है। आपके कितने लोन है , किसका कितना बैलेंस है , रेगुलर है कि नहीं आदि  ब्यावरा होता  है ।

बैंकों और वित्तीय संस्थानों की मदद करना 

जब कोई व्यक्ति लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन करता है, तो बैंक उसकी साख (Creditworthiness) जांचने के लिए CIBIL से उसकी क्रेडिट रिपोर्ट मांगते हैं। जब आप बैंक में लाइन के लिए एप्लाई करते है , तब बैंक सबसे पहले आपकी Cibil  निकालता है , ताकि जान सके आपका स्कोर क्या है , और क्या आपने उससे पहले वाले सभी लोन टाइम पर भरे है । यह सब जानकारी उसे CIBIL से प्राप्त होती है ।

क्रेडिट स्कोर तैयार करना: 

यह लोन और क्रेडिट कार्ड के पिछले भुगतानों के आधार पर 300 से 900 के बीच का सिबिल स्कोर (CIBIL Score) कैलकुलेट करता है। स्कोर जितना अधिक होता है, वित्तीय संस्थानों की नजर में व्यक्ति की साख उतनी ही बेहतर मानी जाती है।


CIBIL  कैसे काम करता है ?

हमने ऊपर बहुत खुश cibil के बारे में जानकारी प्राप्त की , की वह क्या क्या  करता है , आइए अब हम विस्तार से जानने का प्रयास करेंगे कि cibil कैसे काम करता है ।

1. व्यक्ति बैंक से वित्तीय सुविधा लेता है , मतलब जब किसी बैंक से आप कोई लोन या क्रेडिट कार्ड लेते है 
जैसे कि :

  • Credit Card
  • Personal Loan
  • Home Loan
  • Car Loan
  • Over draft 
  • Consumer Loan आदि।

2. बैंक/वित्तीय संस्था ग्राहक का डेटा रिकॉर्ड करती है
इसमें सामान्यतः ग्राहक की पहचान, खाते/क्रेडिट सुविधा और भुगतान से जुड़ी जानकारी शामिल होती है। बैंक के पास आपके लोन से जुड़ी  सभी जानकारी  होती  ही है ।

3. बैंक यह जानकारी Credit Information Company को रिपोर्ट करता है
भारत में TransUnion CIBIL ऐसी प्रमुख Credit Information Companies में से एक है। बैंक और अन्य credit institutions अपने ग्राहकों के credit accounts और repayment behaviour की जानकारी रिपोर्ट करते हैं। हम पहले ही जान चुके है बैंक आपके लोन से संबंधित जानकारी महीने में दो बार cibil को भेजता है जैसे कि लोन कितना बचा है , EMI रेगुलर है कि नहीं ? कब लोन लिया  गया आदि।

4. CIBIL उस जानकारी को अपने रिकॉर्ड में अपडेट करता है
CIBIL उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति का ₹5 लाख का होम लोन  लिया है, तो रिपोर्ट में loan account, outstanding amount, repayment history आदि जैसी जानकारी दिखाई दे सकती है। बैंकों से भेजी हुई जानकारी Cibil द्वारा अपने डेटाबेस में अपडेट कर दी जाती है ।

भुगतान का रिकॉर्ड लगातार बनता रहता है

मान लीजिए EMI हर महीने ₹15,000 है:

महीना भुगतान CIBIL रिकॉर्ड पर प्रभाव
जनवरी समय पर अच्छा repayment record
फरवरी समय पर अच्छा
मार्च समय पर अच्छा
अप्रैल देर से देर से भुगतान रिपोर्ट हो सकता है

हर महीने की बैंक द्वारा दी गई जानकारी वहां अपडेट होती रहती है , आपके रिकॉर्ड में मेंटेन की जाती है ।

5. CIBIL इन क्रेडिट रिकॉर्ड  से Credit Report तैयार करता है

Credit Report में व्यक्ति के लोन अकाउंट  और repayment history जैसी जानकारी दिखाई जाती है। CIBIL  रिपोर्ट में आपकी बहुत सारी जानकारी दिखाई जाती है , यह रिपोर्ट CIBIL द्वारा तैयार की जाती है ।

7. इसी डेटा के आधार पर CIBIL Score तैयार होता है
CIBIL Score आम तौर पर 300 से 900 के बीच होता है। Score जितना अच्छा होता है, सामान्यतः व्यक्ति की creditworthiness उतनी बेहतर मानी जाती है। कभी कभी स्कोर में -1/ 0 होता है , इसका मतलब आपने अभी तक कोई लोन नहीं लिया है , आपकी कोई क्रेडिट हिस्ट्री नहीं है ।

8. जब व्यक्ति नया Loan/Credit Card मांगता है
जब आप अपने बैंक में जाकर कोई लोन या क्रेडिट कार्ड मांगते है  तो बैंक सबसे पहले cibil की वेबसाइट पर लॉगिन कर के , आपका नाम, आधार कार्ड नंबर, मोबाइल नंबर , एड्रेस डालकर आपका सिबिल  score / cibil रिपोर्ट निकालता है , जिससे बैंक को पता चलता है कि  , आपकी  क्रेडिट History अच्छी है कि नहीं , मतलब आपने लोन टाइम पर चुकाया है कि नहीं ।बैंक या लोन देने वाला  ग्राहक की अनुमति/प्रक्रिया के अनुसार उसकी क्रेडिट रिपोर्ट  और स्कोर  प्राप्त करके आपके लोन एप्लीकेशन  का मूल्यांकन कर सकता है।

लोन देने के लिए और भी बहुत कुछ देखना होता है  जैसे कि आपकी सैलरी या इनकम कितनी है , आपको कौन सा लोन चाहिए  ? बैंक के नियम क्या है , आपके पहले के  कौन कौन से लोन चल रहे है , जिसके लिए लोन जैसे कि गाड़ी या घर उसकी कितनी कीमत है आदि , देखकर फैसला किया जाता है कि लोन देना है या नहीं ।

9. Loan लेने के बाद प्रक्रिया फिर शुरू हो जाती है
नया लोन  → बैंक में repayment → बैंक द्वारा सिबिल को जानकारी भेजना → CIBIL द्वारा  रिकॉर्ड अपडेट करना → भविष्य में फिर आपका क्रेडिट स्कोर तय करना ।

कुछ महत्वपूर्ण जानकारी 

 1.CIBIL खुद लोन पास  या रिजेक्ट  नहीं करता। Cibil सिर्फ़ आपकी  क्रेडिट  history बैंक को देता है , यह निर्णय लेने के लिए  कि व्यक्ति को लोन देना है कि नहीं ।

2 .आपका क्रेडिट स्कोर अगर अच्छा है , तो यह मतलब नहीं कि आपको लोन मिल ही जाएगा , लोन देने के लिए जैसा कि हमने ऊपर देखा कि  बहुत कुछ देखकर  लोन दिया  जाता है ।

3. आप हमेशा अपना EMI टाइम पर भरे , ताकि आपका क्रेडिट score अच्छा रहे ,  OTS ( One time settlement )  करने से हमेशा बचे , क्योंकि यह आपका cibil हमेशा के लिए खराब कर देता है , और  भविष्य में आपको कोई बैंक लोन नहीं देगा ।

4.  आप अपना हर महीने का EMI  समय पर भरे , क्योंकि है जैसा कि हम समझ चुके है कि  महीने में २ बार आपका क्रेडिट की जानकारी बैंकों द्वारा cibil को भेजी जाती है , इसलिए हमेशा ध्यान रखे आपका  लोन एक रुपए भी overdue  न रहे ।


आप ने इस लेख में cibil से जुड़ी , बहुत सी महत्वपूर्ण  जानकारी के बारे में चर्चा की , cibil के बारे बहुत कुछ समझना बाकी है , लेकिन यह लेख बहुत बड़ा हो गया , इस लिए अब आगे की जानकारी अगले लेख में ।  मैं आशा करता हु कि , मेरा यह लेख  आपके बैंकिंग और फाइनेंस से जुड़ी यात्रा में सहयोगी होगा , यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।

धन्यवाद।



(SCSS)सीनियर सिटीज़न सेविंग स्कीम

सीनियर सिटीज़न सेविंग स्कीम (SCSS): वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षित निवेश और शानदार रिटर्न


SCSS benefits
Benefits of SCSS


सीनियर सिटीज़न सेविंग स्कीम (SCSS) भारत सरकार की एक बेहद लोकप्रिय और सुरक्षित छोटी बचत योजना है, जो विशेष रूप से सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) और वरिष्ठ नागरिकों के लिए बनाई गई है। आज के समय में कहा जाए कि सरकारी बैंक FD  पर कितना इंटरेस्ट देते है , तो आप कहेंगे कि ज्यादा से ज्यादा 7% , पर उसके विपरीत सिर्फ SCSS  ही एक एडी स्कीम है जो सबसे ज्यादा ब्याज  देती  8.20%  इंटरेस्ट  देता है , इस तरह यह सबसे ज्यादा ब्याज देने वाली  SCHEME  कह सकते है । यह भारत सरकार द्वारा मुख्य रूप से ६० साल के ऊपर के लोगों के लिए  बनाया गया है , ताकि आप  रिटायर होने के बाद अपना पैसा सुरक्षित , और ज्यादा ब्याज के साथ रख सके । पिछले लेखों में हमने FD , RD, और  PPF के बारे में विस्तार से जाना , PPF भी  एक सरकारी योजना है सबके लिए । अगर आप  इनके   बारे में पढ़ना चाहते है तो यहां PPF , FDR, RD पर  CLICK  कर के पढ़ सकते है , उसके बाद आप SCSS को भी अच्छे से समझ पाएंगे ।  आइए अब हम इसे और अच्छे तरीके से समझने का प्रयास करते है ।

क्या आप जानते है ?

SCSS के आने से पहले बुजुर्गों के लिए 'Senior Citizens Deposit Scheme, 1993' जैसी कुछ अन्य योजनाएं थीं। सरकार ने पुरानी व्यवस्थाओं को और अधिक आकर्षक, सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए इस नई और उन्नत योजना को पेश किया।

Senior Citizen Savings Scheme (SCSS) की शुरुआत भारत सरकार द्वारा वर्ष 2004 में की गई थी। 2004 में इसे लाया गया था ।

इस योजना को शुरू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य देश के वरिष्ठ नागरिकों (Senior Citizens) को रिटायरमेंट के बाद एक सुरक्षित, निश्चित और नियमित आय (Regular Income) का स्रोत प्रदान करना था।

इसे भारत सरकार के पोस्ट ऑफिस सेविंग्स नेटवर्क (India Post) और अधिकृत कमर्शियल बैंकों के माध्यम से लॉन्च किया गया था, ताकि देश के बुजुर्ग आसानी से इसका लाभ उठा सकें।

 सबसे पहले  अगर आप रिटायरमेंट के बाद किसी से  , पूछते है कि पैसा कहा इन्वेस्ट करना  है  ? तो , यह जवाब अवश्य आता है कि SCSS , इस योजना के  बहुत सारे फायदे है , और यह वरिष्ठ नागरिकों में  बहुत लोकप्रिय है , अब हम  इस योजना से जुड़ी मुख्य  बातों पर चर्चा करेंगे :

ब्याज  कितना मिलेगा ?

सबसे पहला  सवाल होता है , ब्याज कितना है ? वर्तमान  मतलब अगस्त , 2026 में इस योजना पर 8.2% प्रति वर्ष की दर से ब्याज मिल रहा है, जिसकी समीक्षा सरकार द्वारा हर तिमाही (Quarterly)  या हर तीन महीने में की जाती है। एक बार खाता खुलने पर यह ब्याज दर पूरे कार्यकाल (5 साल) के लिए लॉक हो जाती है। मतलब अगर बीच में बदल भी जाए तो आपका ब्याज दर 8.20 % ही रहेगा 5 साल तक ।

क्या आप जानते है ?

अगस्त 2004 में जब योजना शुरू हुई, तब से लेकर मार्च 2012 तक ब्याज दर 9.0% पर स्थिर रही थी ।

2012-13: 9.30%

2013-2015: 9.20%

2015-2016: बढ़ाकर फिर से 9.3% कर दी गई थी ।

सरकार ने तिमाही समीक्षा के आधार पर दरों में धीरे-धीरे कटौती करना शुरू किया। वर्ष 2016 से 2019 के बीच यह दर घटकर 8.3% से 8.7% के बीच रही।

इसके बाद वर्ष 2020 की शुरुआत में यह घटकर 8.6% और फिर कोविड काल के दौरान गिरकर सीधे 7.4% पर आ गई 

ब्याज दरों में सुधार हुआ और यह बढ़कर 7.4% से 7.6% और फिर 8.0% तक पहुँची ।

अप्रैल 2023 से यह दर स्थिर रूप से 8.2% पर बनी हुई है और वर्तमान तिमाही में भी यही लागू है।

अधिकतम ब्याज दर  9.30%  और न्यूनतम ब्याज दर 7.40 %  तक गई  है । इससे आप जान सकते है कि समय के साथ उतार - चढ़ाव  समय समय पर होता रहता है , लेकिन एक बार आप जिस समय SCSS में पैसा जमा करते है , वही ब्याज 5 साल तक रहता है ?

ब्याज  कैसे मिलेगा  ?

इसका ब्याज हर तिमाही (हर 3 महीने में - अप्रैल, जुलाई, अक्टूबर और जनवरी के पहले दिन) सीधे निवेशक के बैंक खाते में जमा किया जाता है। इसका ब्याज आप  अपने बचत खाता में ले सकते है । इसमें एक बात ध्यान रखे , मान लीजिए आप ने खाता 1  मार्च को   खोला तो , आपका पहला  ब्याज  अप्रैल में जमा होगा 1 तारीख को , लेकिन वो ३ महीने का नहीं बल्कि 1 महीने का होगा  क्योंकि आपने SCSS  में पैसा  ब्याज मिलने की तारीख से एक महीने पहले खोला है ,ब्याज मिलने का महीने और तारीख का समय हमेशा एक ही रहता है ,  उसके बाद फिर अगला जुलाई में और 3-3 महीने पर जमा होता रहेगा  । मतलब आप जब भी पैसा जमा करते है , तो सबसे पहले ब्याज आपको अप्रैल, जुलाई, अक्टूबर और जनवरी के 1 तारीख को मिलेगा , आपने जब खाता खोला उसके आधार पर , उसके बाद हर 3 महीने में मिलता रहेगा |

कितने दिन के लिए जमा  होता है ?

इस योजना का मैच्योरिटी पीरियड 5 वर्ष है। इसे पूरा होने के बाद एक बार में केवल 3 साल के लिए और बढ़ाया जा सकता है। ५ साल का term period होता है , उसके बाद केवल एक बार ३ साल के लिए बढ़ा सकते है  फिर मैच्योर हो जाता है।, लेकिन फिर से आप ५ साल के लिए नया कर सकते है । मतलब कम से कम 5 साल तक रखा जा सकता है |

कितना जमा कर सकते है ?

 न्यूनतम निवेश: ₹1,000

 अधिकतम निवेश: ₹30 लाख (व्यक्तिगत या संयुक्त खाते में)

पहले इसमें  1500000/-  ही जमा किए जा सकते थे , अब बढ़ाकर  3000000/ कर दिया गया है , संयुक्त मतलब अलग अलग बैंक के  मिलाकर टोटल  रकम 3000000/- से ज्यादा नहीं हो सकती । आपके पास अगर  1000/- भी है तो आप SCSS  में जमा कर सकते है | एक बात ध्यान  रखने की है कि अलग अलग बैंक , मतलब आप दो अलग  अलग बैंकों में 1500000/- और 1500000/- रख सकते है |

कौन SCSS   खाता खोल  सकता है ?

कोई भी  60 वर्ष या उससे अधिक आयु का  भारतीय नागरिक। 

55 से 60 वर्ष की आयु के वे कर्मचारी जो वीआरएस (VRS) या सुपरएनुएशन ले चुके हैं (बशर्ते रिटायरमेंट लाभ मिलने के 1 महीने के भीतर खाता खोला गया हो)। आपको रिटायरमेंट का डॉक्यूमेंट बैंक में दिखाना होता है और आपके रिटायरमेंट के एक महीने के भीतर ये खाता अवश्य खोल ले |

रक्षा सेवा (Defense) से रिटायर होने वाले कर्मचारियों के लिए आयु सीमा 50 वर्ष है। यहां भी आपको डॉक्यूमेंट दिखाना होता है , तब बैंक आपका SCSS चालू कर देता है । रिटायर होने के तुरंत बाद अवश्य SCSS में पैसा जमा कर दे, नहीं तो फिर 60 साल तक इंतजार करना पड़ेगा |

कौन SCSS नहीं कर सकता हैं ?

हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) और एनआरआई (NRI) इस योजना के पात्र नहीं हैं।

जिसकी आयु ६० साल से कम हो , वह SCSS में पैसा जमा नहीं कर सकता। 

क्या ज्वाइंट अकाउंट  खोला जा सकता है ?

हां, सीनियर सिटिजन सेविंग्स स्कीम (SCSS) के तहत ज्वॉइंट अकाउंट खोला जा सकता है, लेकिन इसके कुछ विशेष नियम हैं:
 1.  SCSS में आप केवल अपने   पति या पत्नी (Spouse)  के साथ ही ज्वॉइंट अकाउंट खोल सकते हैं। अन्य किसी रिश्तेदार या व्यक्ति के साथ ज्वॉइंट खाता खोलने की अनुमति नहीं है।
 2.   ज्वॉइंट अकाउंट में मुख्य या पहला नाम उसी व्यक्ति का होना चाहिए जो SCSS की पात्रता (जैसे 60 वर्ष या उससे अधिक की आयु, या तय नियमों के तहत सेवानिवृत्त कर्मचारी) को पूरा करता हो।
 3.  ज्वॉइंट खाते में जमा की जाने वाली पूरी राशि केवल  पहले खाताधारक   की ही मानी जाती है।
 4.  खाताधारक की आयु 60 वर्ष होने पर, यदि उनके जीवनसाथी की आयु 60 वर्ष से कम भी है, तब भी उन्हें ज्वॉइंट होल्डर बनाया जा सकता है।

कर लाभ (Tax Benefits):

इस योजना में आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत  सिर्फ ₹1.5 लाख तक के निवेश पर टैक्स छूट का लाभ मिलता है। मतलब आप इसमें कितना भी पैसा डाले 150000/- के ऊपर लेकिन आपको छूट सिर्फ 150000/-  तक ही मिलेगी उस साल में |

इस  पर मिलने वाला ब्याज पूरी तरह कर योग्य (Taxable) है,  जो भी ब्याज मिलेगा उसपर आपको टैक्स देना होगा | एक वित्तीय वर्ष में ब्याज ₹50,000 से अधिक होने पर टीडीएस (TDS) कट सकता है। मतलब अगर आप  600000/ के ऊपर पैसा जमा करते है तो TDS कटेगा। जिसे आप बाद में ITR भर कर वापस ले सकते है ।

समय से पहले निकासी (Premature Closure): 

अगर   आपने ५ साल के लिए रखा और उससे पहले ही आपको पैसे की जरूरत पड़ जाए और बंद करना पड़े तो क्या नियम है ?

खाता खोलने के 1 साल के भीतर बंद करने पर कोई ब्याज नहीं मिलता। अगर १ साल से पहले बंद किया जाए तो उसपर १ रुपए भी ब्याज नहीं मिलता है , इसलिए इसमें सोच समझ कर पैसा डाले जिसकी आपको ५ साल जरूरत नहीं पड़ेगी , वहीं  पैसा उसमें जमा करे । चुकी इस स्कीम पर  तिहामी ब्याज मिलता हैं , इसलिए जब आप जमा करते है ब्याज ३ महीने बाद मिलने लगता है , लेकिन जब आप एक साल से पहले बंद करने जाते है तो यह पैसा आपके मूलधन में से काट लिया जाता है , जो ब्याज आपको दिया गया है उतना । इस लिए  हमेशा अगर आपको 15  लाख जमा करना है तो , 3  SCSS बनाए ५०००००/ के , ताकि अगर कभी जरूरत पड़ जाए तो एक तोड़कर काम हो जाए ।

अगर 1 से 2 साल के बीच बंद करना पड़ा तो आपके   मूलधन  या जितनबा पैसा आपने जमा किया था , का 1.5% काट  लिया जाता है , आइए इस अच्छे से समझते है |  मान लीजिए आपने  1000000/ रखा है  और एक साल के बाद आपको तोड़ने की जरूरत पड़ गई तब  बैंक / पोस्ट ऑफिस   आपका जमा पैसे का  1.5% मतलब  15000/- काट   लेगा  ।

अगर आपको  2 से 5 साल के बीच बंद करना पड़ा तो   1% की कटौती (पेनल्टी) का प्रावधान है ।  अगर 2 साल पूरे हो गए तो 1 % मतलब  10 लाख का 10000/- काट लिया  जाएगा |

इसलिए हमेशा इसमें वही पैसा रखे जिसकी आपको   5 साल में जरूरत  नहीं पड़ेगी । 

क्या लोन मिलता है ?

SCSS पर कोई लोन नहीं ले  सकते आप , ध्यान रखे इसलिए इसमें वही पैसा रखे जिसकी जरूरत आपको ५ साल नहीं लगेगी , अगर  लोन  चाहिए तो आप बैंक FD कर सकते है , जिसपर आप कभी भी 90 % तक  लोन ले सकते है ।  अपना पैसा अलग अलग बाट कर जमा करे , थोड़ा FD, कुछ PPF और SSC , इससे आपको  जरूरत पड़ने पर दिक्कत नहीं होगी।

SCSS कहा खोला जा सकता है ?

आप देश के किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (Public Sector Bank) या चुनिंदा निजी बैंकों (Private Banks) में SCSS (Senior Citizen Savings Scheme)  खाता खुलवा सकते हैं। 
भारत के किसी भी पोस्ट ऑफिस या डाकघर में SCSS अकाउंट आसानी से खोला जा सकता है। आपका  जिस भी बैंक में अकाउंट हो  वहां आप  अकाउंट खोल सकते है |

सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम खोले के लिए क्या क्या आवश्यक है ?

सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम (SCSS) के तहत खाता खोलने के लिए निम्नलिखित दस्तावेजों और औपचारिकताओं की आवश्यकता होती है:
 1. SCSS खाता खोलने का फॉर्म (Account Opening Form)   बैंक या पोस्ट ऑफिस से मिलने वाला निर्धारित आवेदन फॉर्म।
 2. पहचान प्रमाण (Identity Proof):    पैन कार्ड, आधार कार्ड, वोटर आईडी, या पासपोर्ट में से कोई एक।
 3. पते का प्रमाण (Address Proof):   आधार कार्ड, बिजली बिल, राशन कार्ड, या पासपोर्ट।
 4. बआयु प्रमाण (Age Proof):  
  •  60 वर्ष या उससे अधिक आयु के सामान्य नागरिकों के लिए (आधार कार्ड, पैन कार्ड, या जन्म प्रमाण पत्र)।
  •   55 से 60 वर्ष की आयु वाले सेवानिवृत्त रक्षा कर्मचारियों (Defense Employees) के लिए रिटायरमेंट का प्रमाण और आयु प्रमाण।
  •  50 से 60 वर्ष की आयु वाले अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े दस्तावेज।
  •   पासपोर्ट साइज फोटोग्राफ: खाताधारकों की हाल ही में खींची गई तस्वीरें (ज्वॉइंट अकाउंट होने पर दोनों की)।
  •  पैन कार्ड (PAN Card)   निवेश और टीडीएस (TDS) उद्देश्यों के लिए अनिवार्य।
 5. आरंभिक राशि:    खाता खोलने के लिए न्यूनतम 1,000 रुपये या उससे अधिक की चेक/नकद राशि (निवेश अधिकतम 30 लाख रुपये तक हो सकता है)।

हमने SCSS ( सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम) के बारे में लगभग सभी विषयों पर चर्चा करने का प्रयास किया , अब एक बात  जान लेते है चार्ट के माध्यम से की  आप कितना पैसा रखेंगे 8.20 % रेट से तो 5 साल में कितना होता है , आइए देखते है |

SCSS interest chart
इस चार्ट में हम देख  सकते है कि , 5 साल में कितना  ब्याज quarterly और 5 साल में  जोड़कर  कितना होता है , इस से आप अंदाजा लगा सकते है , कि SCSS सीनियर  लोगो  के लिये  काफी अच्छा है , कुछ पैसा तो इसमें  जरूर  रखना चाहिए | इस लेख को पढ़ने के बाद  मैं आशा करता हु आप SCSS अच्छे से  समझने लगे होगे | इस लेख  को पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद |

धन्यवाद |



BHIM क्या है ?

BHIM (Bharat Interface for Money)



Benefits of Bhim App
Benefits of Bhim 


BHIM (भीम) ऐप भारत सरकार की एक डिजिटल भुगतान सेवा है, जो यूपीआई (UPI) तकनीक पर काम करती है ,  इसे दिसंबर 2016 में लॉन्च किया गया था, जिसका उद्देश्य देश में कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देना है। पिछले लेख में हमने UPI से संबंधित  बहुत सारे  विषयों पर चर्चा की , UPI क्या  है , किसने बनाया और कैसे कम करता है , इस लेख के पढ़ने से पहले  वह लेख अवश्य पढ़ ले UPI पर लेख पढ़ने के लिए  यहां CLICK करे | हमने  UPI से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण तथ्यों पर चर्चा की है , आइए अब हम उनमें से एक ऐप जो सबसे पहले NPCI , ने बनाया था UPI के द्वारा लेन देन   करने के लिए , एक बात अवश्य जान ले कि  BHIM ही एक ऐसा ऐप है जो स्वयं NPCI , यानी जिसने UPI बनाया उसका है , बाकी सब अलग  अलग कंपनियों ने UPI का इस्तेमाल करके बनाया है  , इसलिए  जहां तक संभव हो आप BHIM का इस्तेमाल करे| आइए  अब हम भीम ऐप  पर चर्चा करते है | क्या आप भीम ऐप इस्तेमाल करते ?

BHIM ऐप की मुख्य विशेषताएं

सुरक्षित और सीधा लेनदेन 

यह ऐप सीधे बैंक खाते से बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर करने की सुविधा देता है। इसमें किसी डिजिटल वॉलेट में पैसे लोड करने की आवश्यकता नहीं होती। सीधे आपके बैंक खाते से दूसरे के खाते में पैसा तुरंत ट्रांसफर होता है , बीच में कोई THIRD  Party नहीं होता , यह सीधे बैंक के अकाउंट से लिंक होकर काम करता है |

कई भाषाओं का समर्थन 

यह ऐप हिंदी और अंग्रेजी के अलावा 15 से अधिक भारतीय भाषाओं को सपोर्ट करता है, जिससे देश के किसी भी हिस्से के लोग इसे अपनी मातृभाषा में आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं। प्रमुख भाषाएं इस प्रकार हैं:
 हिंदी और  अंग्रेजी ,तमिल (Tamil) ,तेलुगु (Telugu), कन्नड़ (Kannada),मलयालम (Malayalam),मराठी (Marathi),गुजराती** (Gujarati),बंगाली** (Bengali) ,पंजाबी** (Punjabi), अड़िया/उड़िया(Odia), असमिया (Assamese) ,उर्दू (Urdu) ,संस्कृत(Sanskrit),कोंकणी(Konkani),मणिपुरी(Manipuri),बोडो(Bodo),डोगरी (Dogri) ,मैथिली(Maithili) ,संथाली (Santali,सिंधी(Sindhi)|  यह एक ऐसा ऐप है जो इतनी भाषाएं में आप इस्तेमाल  कर सकते  है |

विभिन्न भुगतान के तरीके

आप यूपीआई आईडी (VPA), मोबाइल नंबर, क्यूआर कोड (QR Code) स्कैन करके या सीधे बैंक खाता संख्या और IFSC कोड के जरिए पैसे भेज सकते हैं। आप इन  कई  तरीकों से अपना पैसा भेज सकते है |


विशेष आधुनिक फीचर्स (BHIM 3.0)  

इसमें स्पिट एक्सपेंस (दोस्तों या परिवार के बीच खर्च बांटना), फैमिली मोड, खर्च का विश्लेषण (Spend Analytics Dashboard) और बिना इंटरनेट या कम नेटवर्क में भी काम करने जैसी एडवांस सुविधाएं जोड़ी गई हैं।

छोटे भुगतानों के लिए UPI लाइट 

₹500 तक के छोटे भुगतानों के लिए बिना पिन (PIN-less) के तुरंत भुगतान की सुविधा मिलती है। इसे आप अपने ऐप से चालू कर सकते है | आप इसमें अपना क्रेडिट कार्ड भी जोड़ सकते है ।

लेन-देन की सीमा (Transaction Limits)

आप BHIM ऐप के जरिए प्रति दिन अधिकतम ₹1,00,000 (एक लाख रुपये) तक का ट्रांजेक्शन कर सकते हैं| पहले ट्रांजेक्शन लिमिट कम थी , पर आज आप एक दिन में 100000/- तक ट्रांजेक्शन  कर सकते है |

ऐप पहली बार इंस्टॉल करने के शुरुआती 24 घंटों के लिए ट्रांजेक्शन लिमिट ₹5,000 होती है, जो 24 घंटे बाद बढ़कर ₹1 लाख हो जाती है।

कैशबैक और रिवार्ड

​भीम ऐप समय-समय पर (जैसे अपनी सालगिरह या विशेष त्योहारों पर) 100% तक कैशबैक (जैसे छोटे लेनदेन जैसे ₹20 खर्च करने पर पूरा कैशबैक) जैसे खास ऑफर्स अपने यूजर्स के लिए लाता रहता है। यह कैश बैक सीधे आपके अकाउंट में तुरंत क्रेडिट होता  है |

BHIM ऐप से जुड़ी कुछ मुख्य बातें 


1.  इसे सीधे भारत सरकार के अंतर्गत NPCI (National Payments Corporation of India) द्वारा विकसित किया गया है। इसलिए यह गवर्नमेंट ऐप है |
2.  यह पूरी तरह से विज्ञापन-मुक्त (Ad-free) है। इसमें कोई थर्ड-पार्टी ऑफर्स, लोन के विज्ञापन या कैशबैक के लिए अनचाहे फीचर्स नहीं होते।
3. इसका इंटरफेस बहुत ही सरल, हल्का (Lightweight) और सीधा है, जिसे इस्तेमाल करना बेहद आसान है।
4. ​चूँकि भीम ऐप को NPCI द्वारा सीधे बनाया गया है, इसलिए इसे सबसे भरोसेमंद और सुरक्षित प्लेटफॉर्म माना जाता है क्योंकि इसमें बीच में कोई प्राइवेट वॉलेट या बिचौलिया नहीं होता।

इस लेख में हमने बहुत कुछ जाना , यदि और जानना है तो आप  भीम ऐप के official वेबसाइट के लिए यहां  click कर सकते है।

 हमेशा किसी भी नए आदमी को पैसा अगर  अकाउंट या मोबाइल नंबर से भेजना है तो , सबसे पहले आप १ रुपए भेज कर अवश्य चेक कर ले, ताकि आपका पैसा किसी गलत अकाउंट में न जाए । सभी सावधानी के बावजूद अगर  आप का पैसा भीम ऐप में फंस जाता है तो आपको शिकायत  कैसे दर्ज  करना है , आइए अब इस महत्वपूर्ण बात को समझते है , अगर आप  कभी ट्रांजैक्शन कर रहे है, और पैसा डेबिट हो जाता है और  सामने वाले के अकाउंट में क्रेडिट नहीं होता तो क्या करे ?

BHIM App में ट्रांजैक्शन या किसी अन्य समस्या के लिए शिकायत दर्ज करने के दो मुख्य तरीके हैं: ऐप के अंदर (In-app) और एनपीसीआई (NPCI) पोर्टल के माध्यम से।

BHIM ऐप खोलें और Transaction History (लेन-देन इतिहास) पर जाएं।

उस संबंधित ट्रांजैक्शन को चुनें जिसमें समस्या है।

Report Issue या Raise Complaint विकल्प पर क्लिक करें।

अपनी समस्या का कारण चुनें (जैसे- पैसा कट गया लेकिन प्राप्तकर्ता को नहीं मिला) और सबमिट करें।

NPCI पोर्टल के माध्यम से (DigiSaathi / NPCI Dispute Portal):

NPCI की आधिकारिक वेबसाइट npci.org.in पर जाएं या सीधे DigiSaathi (disputeredressal.npci.org.in) पोर्टल का उपयोग करें।

Dispute Redressal Mechanism (DRM) सेक्शन में जाएं।

'UPI' विकल्प चुनें और Transaction ID, UPI ID, बैंक का नाम, और ट्रांजैक्शन की तारीख दर्ज करके शिकायत दर्ज करें।

टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर:

आप NPCI की यूपीआई हेल्पलाइन नंबर 1800-120-1740 पर कॉल करके भी सहायता ले सकते हैं।

आप अपने बैंक में जाकर भी , जिसका अकाउंट उससे जुड़ा हो , वहां फॉर्म भरकर complain कर सकते है , बैंक आपका  complain अपने पोर्टल पर अपडेट कर देता है । आप यही procedure अन्य थर्ड पार्टी ऐप  के लिए भी उपयोग कर सकते है , सभी ऐप में कंप्लेन करने का ऑप्शन होता है । आइए अब हम ऐप से जुड़े कुछ सवाल ले लेते है ।

1. BHIM ऐप क्या है और इसे किसने बनाया है?

यह नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) द्वारा विकसित एक यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) आधारित ऐप है, जिसकी मदद से तुरंत पैसे ट्रांसफर किए जा सकते हैं।

क्या BHIM ऐप इस्तेमाल करने के लिए इंटरनेट जरूरी है?

हाँ, ऐप आधारित ट्रांजैक्शन के लिए इंटरनेट चाहिए, लेकिन बिना इंटरनेट के भी *99# डायल करके यूएसएसडी (USSD) कोड के जरिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

BHIM ऐप की डेली ट्रांजैक्शन लिमिट कितनी है? 

आम तौर पर BHIM ऐप से एक दिन में अधिकतम 1 लाख रुपये तक ट्रांसफर किए जा सकते हैं और प्रति ट्रांजैक्शन की सीमा भी बैंक के नियमों के अनुसार तय होती है।

क्या BHIM ऐप का इस्तेमाल करने पर कोई चार्ज लगता है? 

नहीं, BHIM ऐप से बैंक खाते में पैसे भेजने या मंगाने के लिए एनपीसीआई की तरफ से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है।

BHIM ऐप में एक साथ कितने बैंक खाते जोड़े जा सकते हैं? 

आप अपने एक ही मोबाइल नंबर से जुड़े कई बैंकों के खातों को इस ऐप में लिंक कर सकते हैं और जरूरत के अनुसार प्राइमरी अकाउंट बदल सकते हैं। आप इसमें अपना क्रेडिट कार्ड भी जोड़ सकते है ।

अगर BHIM ऐप से पैसे कट जाएं और सामने वाले को न मिलें तो क्या करें? 

ऐसी स्थिति में ट्रांजैक्शन फेल होने पर आमतौर पर पैसे 3 से 5 दिन में  (working days) के भीतर स्वतः आपके खाते में वापस आ जाते हैं।  अगर उतने दिन में पैसा नहीं आता तो आप ऐप के 'Help' या 'Transaction History' सेक्शन में जाकर शिकायत भी दर्ज कर सकते हैं। या अपने बैंक में जाकर वहां भी शिकायत दर्ज करा सकते है ।

इस लेख में हमने  लगभग सभी पहलू पर जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया , अब अंत में यह जान ले कि  UPI चालू करने के लिए क्या क्या आवश्यकता है ?

  1. एक स्मार्टफोन (एंड्रॉइड या आईओएस)
  2. एक बैंक खाता जिससे आपका मोबाइल नंबर लिंक हो
  3. बैंक खाते से जुड़ा डेबिट/एटीएम कार्ड (UPI PIN सेट करने के लिए)
  4.  कोई भी अपना भीम ऐप पर UPI चालू कर सकता है ।

भारत के कुल डिजिटल ट्रांजैक्शन में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। सरकारी आंकड़ों (PIB/NPCI) के अनुसार, देश के कुल डिजिटल भुगतानों में UPI की हिस्सेदारी लगभग 85% है।

 दुनिया भर में होने वाले कुल रियल-टाइम डिजिटल ट्रांजैक्शन में अकेले UPI की हिस्सेदारी लगभग 49% है ।

वर्तमान में भारत में प्रतिदिन औसतन 60 से 66 करोड़ से अधिक ट्रांजैक्शन केवल UPI के माध्यम से होते हैं।

कुल UPI वॉल्यूम का लगभग 63% हिस्सा मर्चेंट या दुकानदारों को किए जाने वाले भुगतान (Person-to-Merchant) का होता है, जो छोटे और रोजमर्रा के लेन-देन में इसकी भारी लोकप्रियता को दिखाता है।

अगस्त 2026 में UPI लेनदेन की संख्या (Volume) अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। इस महीने कुल 24.51 अरब (24.51 Billion) ट्रांजैक्शन हुए, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 22% अधिक हैं।

अगस्त 2026 में कुल 29.82 लाख करोड़ रुपये मूल्य के लेनदेन किए गए। हालांकि मई और जुलाई 2026 में यह आंकड़ा लगभग 29.9 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड के करीब पहुंच चुका है।

 पिछले एक दशक में UPI के दायरे में भारी बढ़ोतरी हुई है। वित्त वर्ष 2016-17 के शुरुआती दौर से लेकर अब तक ट्रांजैक्शन वैल्यू में 4,000 गुना से अधिक की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है।

भारत का यह डिजिटल पेमेंट नेटवर्क अब देश के बाहर कुल 11 देशों (जैसे सिंगापुर, यूएई, फ्रांस, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और उज्बेकिस्तान आदि) में सक्रिय और स्वीकृत है। और भी देश धीरे धीरे इसे  अपनाने की तैयारी कर रहे है ।


 यह UPI ही है जिससे कि आज आपन १ रुपए भी ऑनलाइन भेज सकते है ,  सब्जी वाले से लेकर दूध वाले और बढ़ी दुकानों और यहां  तक कि फुटपाथ पर समान बेचने वाले भी UPI  का इस्तेमाल करते है  । और यह दुनिया में पहला ऐसा ऐप है । और इस पर सभी भारतीयों  को गर्व होना चाहिए ।  भीम ऐप में कभी कभी जब आप QR  CODE  इमेज गैलरी से सेलेक्ट  करते है तो २०००/- से ज्यादा नहीं भेज पाते , उस समय आप किसी और मोबाइल  में QR  code भेज कर सीधा स्कैन  करके   ट्रांजैक्शन कर सकते है ।   मैं आशा करता हु कि इस लेख से आपको BHIM ऐप से जुड़ी जानकारी प्राप्त  हुई होगी । यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।

धन्यवाद ।

UPI ( यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस) क्या है ?

यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI)

UPI features
UPI benefits


यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) द्वारा विकसित भारत की एक रियल-टाइम मोबाइल पेमेंट प्रणाली है। इसकी मदद से आप तुरंत और आसानी से पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं। शायद ही कोई ऐसा भारत में होगा जिसने UPI , से पेमेंट नहीं किया , मतलब आपने  दुकान  पर स्कैनर से अवश्य पेमेंट किया होगा , और आपके मोबाइल में phonPe, Paytm , GPay, Bhim , इनमे से कोई न कोई ऐप अवश्य इंस्टॉल होगा , लेकिन क्या आप जानते है इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई ? और ये सब कैसे काम करता है ? पहले पेमेंट करना इतना आसान नहीं था जितना कि आज हैं , आप १ रुपए भी ऑनलाइन पेमेंट कर सकते है । आज का विषय है UPI , जिसने ऑनलाइन पेमेंट करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया हमेशा के लिए । आज हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे । आइए सबसे पहले  शुरुआत इसके इतिहास से करते है ।

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) का इतिहास

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) का इतिहास केवल एक नई भुगतान तकनीक की शुरुआत मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत के डिजिटल और आर्थिक क्षेत्र की सबसे बड़ी क्रांतिकारी गाथा है। UPI के विकास और इसके सफर की पूरी कहानी को हम समझने का प्रयास करेंगे । सबसे पहले हम NPCI यानि नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया  से शुरुआत करते है , क्योंकि ये नहीं होता तो UPI नहीं होता , पहले NPCI बना फिर उसने  UPI बनाया , आइए जानते है NPCI के बारे में ।

NPCI की स्थापना

एनपीसीआई (NPCI) की स्थापना भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) के मार्गदर्शन और पहलों के तहत की गई थी। इसे देश के भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 (Payment and Settlement Systems Act, 2007) के प्रावधानों के तहत दिसंबर 2008 में एक 'नॉट-फॉर-प्रॉफिट' (लाभ न कमाने वाली) कंपनी के रूप में गठित किया गया था।

शुरुआत में इसे देश के 10 मुख्य प्रमोटर बैंकों (Core Promoter Banks) ने मिलकर बनाया था। इन शुरुआती बैंकों के नाम नीचे दिए गए हैं:

  1. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI)
  2. पंजाब नेशनल बैंक (PNB)
  3. केनरा बैंक (Canara Bank)
  4. बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda)
  5. यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Union Bank of India)
  6. बैंक ऑफ इंडिया (Bank of India)
  7. आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank)
  8. एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank)
  9. सिटिब बैंक (Citibank N.A.)
  10. एचएसबीसी (HSBC)

इन प्रमुख सार्वजनिक (Public), निजी (Private) और विदेशी बैंकों ने मिलकर एनपीसीआई की शुरुआती वित्तीय और ढांचागत नींव रखी थी, ताकि भारत में डिजिटल भुगतान प्रणाली को मजबूत किया जा सके। बाद में समय के साथ इसके दायरे को बढ़ाया गया और देश के अन्य बैंकों व वित्तीय संस्थानों को भी इसमें शामिल किया गया। और जानकारी की लिए आप NPCI के ऑफिशियल वेबसाइट   https://www.npci.org.in/ पर जाकर प्राप्त कर सकते है।

UPI के आने से पहले पैसे भेजने के लिए NEFT या RTGS का इस्तेमाल किया जाता था, जिसमें समय लगता था। इसके बाद NPCI ने IMPS (Immediate Payment Service) लॉन्च किया, जो 24/7 तुरंत पैसे ट्रांसफर करने की सुविधा देता था। इसी IMPS तकनीक को आगे चलकर UPI का बेस (आधार) बनाया गया। IMPS की चर्चा हम अलग से किसी और लेख में करेंगे , अभी बस इतना समझ लीजिए कि IMPS में सिर्फ मोबाइल SMS का एक फॉर्मेट होता था , उससे पैसा ट्रांसफर किया जा सकता था , विस्तार से चर्चा बाद में करेंगे , अभी UPI की बात करते है ।

आधिकारिक लॉन्च और शुरुआत

11 अप्रैल 2016 को  आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर डॉ. रघुराम राजन ने मुंबई में 21 सदस्य बैंकों के साथ मिलकर UPI का आधिकारिक पायलट लॉन्च किया।

इसका मुख्य उद्देश्य बार-बार बैंक खाता नंबर और IFSC कोड डालने के झंझट को खत्म करना था। इसकी जगह एक वर्चुअल पेमेंट एड्रेस (VPA / UPI ID) के जरिए तुरंत पैसे भेजना या मंगाना संभव बनाया गया।

अगस्त 2016 को  देश के प्रमुख बैंकों ने अपने मोबाइल ऐप्स पर UPI फीचर लाइव करना शुरू किया, जिसके बाद यह आम जनता के लिए पूरी तरह खुल गया।

UPI को आम लोगों तक आसानी से पहुँचाने और इसे बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री जी  ने BHIM (Bharat Interface for Money) ऐप लॉन्च किया। अब हम UPI के इतिहास के बारे में समझ गए , अब हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि यह काम कैसा करता है ?

UPI (Unified Payments Interface) एक रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट सिस्टम है, जिसकी मदद से आप बिना बैंक अकाउंट नंबर या IFSC कोड शेयर किए किसी भी समय, तुरंत एक बैंक अकाउंट से दूसरे बैंक अकाउंट में पैसे भेज और प्राप्त कर सकते हैं।

UPI कैसे काम करता है (प्रक्रिया):

1.UPI का उपयोग करने के लिए आपको किसी भी पेमेंट ऐप (जैसे Google Pay, PhonePe, Paytm या BHIM) पर अपनी बैंक डिटेल्स लिंक करके एक यूनिक आईडी बनानी होती है, जिसे UPI ID कहते हैं (जैसे name@bankname), या mobilenumber@upi। सबसे पहले आप कोई भी ऐप अपने मोबाइल में इंस्टॉल करते है , सबसे पहला काम  वर्चुअल पेमेंट एड्रेस या UPI ID बनाना होता है , कई प्रकार के UPI Id अलग अलग ऐप द्वारा इस्तेमाल किया जाता है 

क्या आप जानते है ?

UPI ID (जिसे Virtual Payment Address या VPA भी कहा जाता है) का एक मानक और निश्चित प्रारूप (Standard Format) होता है। यह हमेशा दो मुख्य भागों से मिलकर बनता है, जिन्हें बीच में '@' (at the rate) चिन्ह से जोड़ा जाता है।

मानक प्रारूप:

\text{Unique Prefix} \text{ @ } \text{Bank/App Handle}

पहला भाग (Prefix / User Identifier): यह यूनिक होता है जिसे यूजर खुद चुनता है। इसमें आपका नाम, मोबाइल नंबर, ईमेल का हिस्सा, या कोई अन्य अल्फा-न्यूमेरिक अक्षर (जैसे letters और numbers) हो सकते हैं।

दूसरा भाग (Suffix / Handle): यह उस बैंक या ऐप को दर्शाता है जिसके साथ वह UPI ID रजिस्टर्ड है। इसे 'हैंडल' (Handle) कहा जाता है (उदाहरण के लिए: paytm, ybl, okaxis, sbi)।

अतिरिक्त नियम और विशेषताएं:

केस-सेंसिटिविटी: UPI ID आमतौर पर केस-इंसेंसिटिव होती है (यानी छोटे या बड़े अक्षर से फर्क नहीं पड़ता, जैसे Rahul@paytm और rahul@paytm एक ही माने जाते हैं)।

विशेष चिन्ह: इसमें अंग्रेजी के अक्षर (a-z), अंक (0-9), और कुछ खास चिन्ह जैसे डॉट (.), हाइफन (-), या अंडरस्कोर (_) का उपयोग किया जा सकता है।

स्पेस की अनुमति नहीं: UPI ID के बीच में कभी भी खाली जगह (Space) नहीं होती है।

अब हम भारत में इस्तेमाल होने वाले लोकप्रिय UPI ID देखते है , जिससे आपको पता चल जाएगा कि ,आमतौर पर कौन से UPI ID भारत में इस्तेमाल होते  है ।

बैंक-आधारित UPI IDs

जिनके लास्ट में बैंक के नाम लगे हुए होते है या  बैंक के शॉर्ट नाम का इस्तेमाल होता है  , जैसे कि 

rahul.kumar@okaxis (Axis Bank)

priya123@okhdfcbank (HDFC Bank)

amit.sharma@ybl (Yes Bank / PhonePe)

pooja@sbi (State Bank of India)

neha.gupta@okicici (ICICI Bank)

थर्ड-पार्टी ऐप्स के UPI हैंडल (Handles)

भीम ऐप UPI का ऑफिशियल ऐप है , उसके अलावा सब  थर्ड पार्टी ऐप होते है , इनमें से लगभग आपने सभी नाम सुने होगे , आइए देखते है ।

Google Pay: name@okhdfcbank या name@okaxis

PhonePe: name@ybl या name@ibl

Paytm: name@paytm

BHIM App: name@upi

आप अपनी पसंद का कोई भी उपलब्ध नाम (जैसे अपना नाम या फोन नंबर का हिस्सा) चुनकर अपनी खुद की UPI ID बना सकते हैं। यहां हमने upi id के लगभग सभी पहलू अच्छे से समझने का प्रयास किया , आप इनमें से UPI ID चुन सकते है । सबसे पहले आपने UPI ID बना ली । अब पिन सेट करना है ।

UPI पिन (MPIN) 

ट्रांजैक्शन को सुरक्षित रखने के लिए 4 या 6 अंकों का एक सीक्रेट पिन सेट करना होता है, जो पैसे भेजते समय दर्ज करना अनिवार्य होता है। पिन चुनते समय हमेशा ऐसा पिन चुने जो आप ध्यान रख सके ।

पहली बार UPI चालू करने की प्रक्रिया 

अब हम यह बात करेंगे कि आप सबसे पहली बार UPI कैसे चालू कर सकते है , आइए अब विस्तार से चर्चा करते है ।

किसी भी नए UPI ऐप (जैसे PhonePe, Google Pay, Paytm, BHIM या Bajaj Pay आदि) में UPI चालू करने और नया अकाउंट सेट अप करने की  पूरी प्रक्रिया पर हम आराम से चर्चा करेंगे , ताकी आप अच्छे से समझ सके ।

ऐप डाउनलोड और इंस्टॉल करना 

सबसे पहले अपने स्मार्टफोन के Google Play Store (Android) या Apple App Store (iPhone) से अपनी पसंद का कोई भी UPI पेमेंट ऐप डाउनलोड करके इंस्टॉल करें। जैसे PhonePe, Bhim, GPay आदि ।

भाषा का चयन और मोबाइल नंबर दर्ज करना

अब आपका ऐप ओपन  करे अपनी पसंदीदा भाषा (जैसे हिंदी या अंग्रेजी) चुनें। इसके बाद अपना वह मोबाइल नंबर दर्ज करें जो आपके बैंक अकाउंट के साथ रजिस्टर्ड (लिंक) है। ध्यान दें कि वेरिफिकेशन के लिए सिम कार्ड इसी फोन में लगा होना चाहिए। आपके फोन अगर दो सिम है , तो डिफॉल्ट sms  उस नंबर से कर दे जो आपके अकाउंट से जुड़ा हो , अगर आपका नंबर अकाउंट से नहीं जुड़ा होगा तो  यहां से आगे नहीं जा पाएंगे ।

मोबाइल नंबर का वेरीफिकेशन (OTP)

मोबाइल नंबर डालने के बाद 'Verify' या 'Continue' पर क्लिक करें। आपके उस नंबर पर एक ऑटोमैटिक OTP (वन-टाइम पासवर्ड) आएगा, जो ऐप द्वारा अपने आप डिटेक्ट कर लिया जाएगा और आपका नंबर वेरिफाई हो जाएगा। अगर ऐप डिटेक्ट नहीं करता तो आप खुद भी टाईप करके डाल सकते है, ओटीपी डालते ही आप आगे बढ़ जाते है।

बैंक अकाउंट लिंक करना

बिना बैंक अकाउंट लिंक किए आप  कोई पैसा नहीं भेज पाएंगे , इसलिए यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है , सफलतापूर्वक लॉगिन होने के बाद ऐप के होम पेज या प्रोफाइल सेक्शन में जाएं। वहां 'Add Bank Account' या 'Link Bank Account' के विकल्प पर क्लिक करें। आपके सामने बैंकों की एक सूची आएगी, उसमें से आपका खाता जिस बैंक में  हो और आपका अकाउंट नंबर लिंक हो  उस बैंक का नाम चुनें। ऐप आपके मोबाइल नंबर से जुड़े बैंक खाते की खोज  करने के लिए प्रोसेस करेगा , अगर मिल जाता है तो ऐप  उसे आपके  UPI ID से जोड़ देगी। मतलब जब आप ट्रांजैक्शन UPI से करेंगे इसी अकाउंट से पैसा  कटेगा  अवश्य ध्यान रखे ।

UPI पिन सेट करना (अत्यावश्यक चरण)

यदि आप इस बैंक खाते का पहली बार किसी UPI ऐप में इस्तेमाल कर रहे हैं, तो आपको UPI PIN बनाना होगा। UPI  पिन सेट करने की प्रक्रिया नीचे दी गई है ,  aapna ATM debit Card  जो उस खाते से लिंक हो , पास में रख ले  , अब यह प्रक्रिया ध्यान से समझ ले और आपका  पिन हमेशा गोपनीय  रखे  ।

1. इसके लिए 'Set UPI PIN' या 'Create PIN' पर क्लिक करें।

2. अपने डेबिट कार्ड/एटीएम कार्ड के आखिरी 6 अंक और उसकी एक्सपायरी (माह और वर्ष) दर्ज करें।

3. आपके बैंक रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर एक ओटीपी आएगा, उसे दर्ज करें।

4. इसके बाद अपनी पसंद का 4 या 6 अंकों का गुप्त UPI पिन दर्ज करें और दोबारा दर्ज करके उसकी पुष्टि करें। अब आपका पिन सेट हो चुका है।

UPI ID की जाँच करना या नई बनाना

बैंक खाता लिंक होने के बाद ऐप स्वतः ही आपकी एक यूनीक UPI ID बना देता है (जैसे mobilenumber@ybl या name@oksbi)। आजकल कई ऐप्स में अपनी पसंद के अक्षरों या नंबरों मिलाकर कस्टम (मनपसंद) UPI ID बनाने का विकल्प भी मिलता है, जिसे आप प्रोफाइल में जाकर सेट कर सकते हैं। UPI ID की चर्चा हम विस्तार से कर चुके है ।

इन चरणों को पूरा करने के बाद आपका नया UPI ऐप पूरी तरह तैयार हो जाता है। अब आप किसी भी दुकान के QR कोड को स्कैन करके या, C/O किसी के मोबाइल नंबर व UPI ID पर आसानी से पैसे भेज सकते हैं और बैलेंस चेक कर सकते हैं। और जान सकते है कि सब सही सही हो गया है । एक बात अवश्य ध्यान रखे  किसी भी मोबाइल नंबर या बैंक अकाउंट में पहला  ट्रांजैक्शन  १ रुपए का करके उस व्यक्ति से अवश्य पूछ कर कन्फर्म कर ले ताकि आपका पैसा किसी और को न  चला जाए ।

लेनदेन (Transaction) की पूरी प्रक्रिया

अब हम बात करते है UPI ट्रांजैक्शन काम कैसे करता है ,  कैसा  चलता है , आइए इसको समझने का प्रयास करते है ।

शुरुआत (Initiation): 

पैसे भेजने वाला व्यक्ति ऐप खोलकर या तो रिसीवर की UPI ID दर्ज करता है, या दुकान/व्यक्ति का QR कोड स्कैन करता है और राशि (Amount) टाइप करता है। सबसे पहले आप अपने ऐप ओपन करते है , आपको मोबाइल नंबर/ qr code / Bank account सेलेक्ट करते है , उसका जिसको आपको पैसा भेजना होता है , फिर आप  जितना पैसा देना हो उतनी राशि टाइप करते है ।

पिन दर्ज करना: 

राशि दर्ज करने के बाद, भेजने वाला अपना गोपनीय UPI पिन डालता है। जो आपने सेट की थी वो दर्ज करनी होती है ।

बैंक वेरिफिकेशन:

इस  रिक्वेस्ट  को  NPCI आपके बैंक को भेज देता है , आपका बैंक आपका पिन और  अकाउंट बैलेंस चेक करता है     बैंक पिन की जांच करता है और अकाउंट में पर्याप्त बैलेंस सुनिश्चित करता है।

सफलता (Completion): 

वेरिफिकेशन सफल होने पर भेजने वाले के खाते से पैसे कटकर तुरंत प्राप्तकर्ता (Receiver)  बैंक खाते में जमा हो जाते हैं, और दोनों पक्षों को तुरंत नोटिफिकेशन मिल जाता है।और आपको तुरंत बैंक से पैसे काटने का मैसेज प्राप्त हो जाता है ।

NPCI ने UPI को एक 'ओपन API' स्टैंडर्ड बनाया। इसका परिणाम यह हुआ कि सिर्फ बैंकों के अलावा Google Pay, PhonePe, और Paytm जैसे थर्ड-पार्टी ऐप्स (TPAPs) ने इस इकोसिस्टम में प्रवेश किया। इन ऐप्स के आसान यूजर इंटरफेस और कैशबैक ऑफर्स ने UPI को घर-घर तक पहुँचा दिया।

इस लेख में हमने  UPI कैसे चालू करे , पहली बार , पिन सेट करना इत्यादि , अभी UPI से जुड़ी बहुत सारी जानकारी है , UPI  ने हाल ही में १० साल पूरे कर लिए , और आज डिजिटल ट्रांजैक्शन का मतलब UPI  ही है , अब आगे की चर्चा अगले लेख में  करेंगे क्योंकि यह लेख काफी बड़ा हो गया है ,  मै आशा करता हु कि  आपको UPI के विषय में चर्चा करके अच्छा लगा होगा । यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।

धन्यवाद ।


RTGS क्या है?

 RTGS (Real-Time Gross Settlement)


RTGS transaction Flow
RTGS TRANSACTION FLOW

RTGS (Real-Time Gross Settlement) बड़े पैमाने पर फंड ट्रांसफर के लिए भारत की एक प्रमुख और सुरक्षित वित्तीय प्रणाली है। इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा संचालित किया जाता है। पिछले लेख में हमने  NEFT के बारे में विस्तार से चर्चा की , इस लेख में आगे  जाने से पहले  उस लेख को यहां click एक बार अवश्य पढ़ ले ,  ताकि आपको RTGS  समझने में आसानी हो सके ।इस लेख में हम आरटीजीएस के बारे में विस्तार  से चर्चा करेंगे , NEFT हम कम से कम १ रुपए का भी कर सकते थे , और वो बैच में ट्रांजैक्शन पूरा होता है , लेकिन RTGS , कम से कम २ लाख या २ लाख के ऊपर ही किया जा सकता है , और यह  एक एक ट्रांजैक्शन अलग अलग पूरा किया जाता है । आइए अब इसके  मुख्य विषयों  पर चर्चा करते है ।

क्या आप जानते है ?

दुनिया में सबसे पहले इस तरह की प्रणाली की शुरुआत अमेरिका के फेडरल रिजर्व (US Fedwire System) द्वारा 1970 में टेलीग्राफ के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर के रूप में की गई थी, जिसमें RTGS के कई गुण मौजूद थे।

1980 के दशक के मध्य में ब्रिटेन (CHAPS, 1984) और फ्रांस (SAGITTAIRE, 1984) ने आधुनिक स्वरूप वाली प्रणालियाँ विकसित कीं। इसके बाद 1990 के दशक में दुनिया भर के कई केंद्रीय बैंकों ने इसे अपनाया।

भारत में RTGS का इतिहास 

भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा 26 मार्च 2004 को पायलट बेसिस पर (शुरुआत में केवल 4 बैंकों के साथ SBI, HDFC, Standard Chartered bank, Aur sarswat cooperative Bank ) RTGS की शुरुआत की गई थी।
इसका मुख्य उद्देश्य देश में बड़े मूल्य (High-Value) के फंड ट्रांसफर को बिना किसी क्रेडिट या सेटलमेंट जोखिम के तुरंत (Real-Time) और सुरक्षित तरीके से एक बैंक से दूसरे बैंक में भेजना था।
शुरुआत में इसके तहत न्यूनतम राशि की सीमा ₹2 लाख तय की गई थी और यह केवल बैंक के कामकाजी घंटों (Working Hours) के दौरान ही उपलब्ध होता था।
 
डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने और ग्राहकों की सुविधा को बढ़ाने के लिए आरबीआई ने 14 दिसंबर 2020 से RTGS सेवा को साल के 365 दिन, सातों दिन और 24 घंटे (24x7x365) उपलब्ध करा दिया।

मुख्य विशेषताएं (Key Features)

 रियल-टाइम (Real-Time):

इसमें भुगतान के लिए कोई इंतजार नहीं करना पड़ता। जैसे ही ट्रांजैक्शन सबमिट होता है, पैसा कुछ ही मिनटों (आमतौर पर कुछ सेकंड से लेकर आधे घंटे के भीतर) में प्राप्तकर्ता के खाते में जमा हो जाता है।आपका पैसा तुरंत आपके एक बैंक के खाते से दूसरे बैंक के खाते में कुछ ही देर में  ट्रांसफर कर दिया जाता है ।

 ग्रॉस सेटलमेंट (Gross Settlement): 

इसका अर्थ है कि हर एक ट्रांजैक्शन का हिसाब अलग-अलग व्यक्तिगत रूप से (One-to-One basis) किया जाता है। इसमें कई लेन-देन को आपस में जोड़ा (Batching) नहीं जाता। मतलब एक ट्रांजैक्शन एक ही होता है और वैसे ही किया जाता है वन तो वन ।

  सीमाएं (Limits):

 RTGS के माध्यम से कम से कम ₹2,00,000 (2 लाख रुपये) या उससे अधिक ही ट्रांसफर कर सकते हैं। इससे कम राशि के लिए NEFT या UPI/IMPS का उपयोग किया जाता है। २०००००/ से कम के लिए NEFT का उपयोग किया जाता है ।

RBI की तरफ से इसकी कोई ऊपरी अधिकतम सीमा तय नहीं की गई है, हालांकि सुरक्षा और बैंक नियमों के आधार पर अलग-अलग बैंकों की अपनी दैनिक सीमाएं हो सकती हैं।वह आप अपने बैंक से जान सकते है ।

उपलब्धता (Timings):

यह सेवा 24×7, वर्ष के 365 दिन (सप्ताह के सातों दिन, छुट्टियों और रविवार सहित) उपलब्ध है। पहले ऐसा नहीं था , आप सिर्फ बैंकिंग के समय में ही , RTGS कर सकते थे । NetBanking से आप  ऑनलाइन RTGS कभी भी कर सकते है । ध्यान  रखे बैंकों के अपने ट्रांजैक्शन लिमिट होते है सुरक्षा के लिए , अधिकतम सीमा निर्धारित की जाती है ।

शुल्क और चार्ज (Charges)

RBI के दिशा-निर्देशों के अनुसार, ऑनलाइन माध्यम से किए जाने वाले RTGS ट्रांजैक्शन आम तौर पर निःशुल्क (Free) होते हैं।अपने बैंक से या बैंक के वेबसाइट से NEFT/RTGS  चार्ज के बारे में अवश्य जान लीजिए ।

  यदि आप बैंक शाखा में जाकर फॉर्म भरकर RTGS करवाते हैं, तो बैंक नियमों के अनुसार मामूली शुल्क (₹25 से ₹50 तक + जीएसटी) लग सकता है। बैंकों में RTGS/ NEFT का लगभग एक ही फॉर्म होता है , जो आपको भरकर चेक जोड़कर देना होता है ।

RTGS करने के लिए आवश्यक विवरण

यदि आप किसी को RTGS के जरिए पैसे भेजना चाहते हैं, तो आपके पास निम्नलिखित जानकारियां होनी चाहिए:

 * प्राप्तकर्ता का नाम (Beneficiary Name)

 * बैंक खाता संख्या (Account Number)

 * खाते का प्रकार (Savings/Current Account)

 * बैंक का IFSC कोड (IFSC Code)

 * बैंक की शाखा का नाम (Branch Name)

यह जानकारी ले कर आप ऑनलाइन या ऑफलाइन अपने बैंक में जाकर फॉर्म भरकर ट्रांजैक्शन कर सकते है , एक बात का अवश्य ध्यान रखें  जानकारी पहले पक्का कर ले , कि सही है कि नहीं , नहीं तो एक बार अगर गलत अकाउंट में पैसा चला गया ,तो वापस लाना बहुत कठिन होता है । इसलिए आप किसी से अकाउंट नंबर जब लेते है तो उसके चेक का  या पासबुक का  फोटो मांग सकते है , ताकि बाद में परेशानी न हो ।RTGS/ NEFT में मुख्य अंतर इतना ही है कि  NEFT १ रुपए का भी किया जा सकता है , और RTGS कम से कम २०००००/ का होना चाहिए। NEFT पहुंचने  मे RTGS से ज्यादा समय लगता है क्योंकि वो आधे आधे घंटे के बैच में होता है और RTGS सीधा हो जाता है । मैं आशा करता हु कि आप NEFT और RTGS अच्छे से समझ गए होगे , और अगली बार जब neft या RTGS करने जाएंगे , तो आपको उसके बारे में सब कुछ पता होगा । यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।

धन्यवाद।

NEFT कैसे काम करता है ?

 

NEFT (National Electronic Funds Transfer) 


NEFT
NEFT



NEFT का पूरा नाम National Electronic Funds Transfer (राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर) है। यह भारत में एक राष्ट्रव्यापी भुगतान प्रणाली है, जिसकी मदद से कोई भी व्यक्ति या संस्था एक बैंक खाते से देश के किसी अन्य बैंक खाते में सुरक्षित रूप से ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर कर सकती है। जब आप एक बैंक के खाते से दूसरे बैंक के खाते में पैसा ट्रांसफर करते है तो वो NEFT  या RTGS से होता है , पिछले लेखों में हमने विभिन्न प्रकार के अकाउंट जैसे बचत खाता , चालू खाता, डिपॉजिट  स्कीम्स , PPF इत्यादि के बारे में विस्तार से चर्चा की , अब हम पैसा एक बैंक से दूसरे बैंक में किस प्रकार भेजा जाता है , उसके विषय में विस्तार से जानेंगे , आइए अब हम सबसे पहले  ये जानते है कि NEFT  और RTGS से पहले यह कम कैसे होता था ।  हम शुरुवात इतिहास से करते है  ,आपने NEFT के बारे में अवश्य सुना होगा , जब आप बैंक में जाते है NEFT करने , बैंक आपको एक फॉर्म दे देता है , और आप भर कर उसके साथ चेक जोड़कर  दे देते है , और आपका पैसा कुछ ही देर में दूसरे बैंक में पहुंच जाता है , पर पहले ये सब इतना आसान नहीं था , आइए अब हम सबसे पहले समझते है पहले यह प्रक्रिया कैसे काम करती थी ।

NEFT और RTGS (जो कि 2000 के दशक के मध्य में आए) से पहले, भारत में एक बैंक से दूसरे बैंक में पैसे ट्रांसफर करना काफी लंबा और कागजी प्रक्रिया वाला काम था। उस समय मुख्य रूप से निम्नलिखित तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था:

1. डिमांड ड्राफ्ट (Demand Draft - DD)

डिमांड ड्राफ्ट या डीडी कभी न कभी तो आप ने अवश्य बनवाया होगा , किसी न किसी काम के लिए , पहले वह एक माध्यम था एक बैंक से दूसरे बैंक में पैसा देने के लिए ,  जिस व्यक्ति को पैसे भेजने होते है , वह अपने बैंक जाता है  और एक 'डिमांड ड्राफ्ट' फॉर्म भरकर उतनी राशि (प्लस बैंक का कमीशन) जमा करता है , और बैंक उसको DD दे देता है , और उसे  जहां जमा करना होता है , वहां जमा कर देता है , इसका इस्तेमाल आज भी बहुत सारे काम जैसे फीस जमा करना , फॉर्म भरना , लोन का पैसा देना, टेंडर  इत्यादि के लिए होता है , पर पहले यही एक माध्यम होता था , आज भी डिमांड ड्राफ्ट का इस्तेमाल  होता है क्योंकि ये कभी बाउंस नहीं होते  इसे कैश की तरह ही समझा जाता है ।

2. चेक (Cheques) और क्लियरिंग हाउस (Clearing House)

आज भी चेक का इस्तेमाल होता है , पर आज चेक एक ही दिन में क्लियर हो जाता है , पहले ऐसा नहीं होता था , लोग एक-दूसरे को अकाउंट पेयी चेक (Account Payee Cheque) देते थे, पाने वाला व्यक्ति चेक को अपने बैंक खाते में जमा करता था। बैंक उस चेक को क्लियरिंग हाउस (Clearing House) में भेजते थे, जहां विभिन्न बैंकों के कर्मचारी आपस में भौतिक चेक का आदान-प्रदान करके हिसाब किताब करते थे इस प्रक्रिया में भी आमतौर पर 3 से 7 कार्य दिवसों (Working Days)  या कभी कभी बाहर का चेक होता था तो इससे भी ज्यादा  का समय लग जाता था। आपने भी कभी न कभी किसको तो चेक जारी किया ही होगा ।

3. टेलीग्राफिक ट्रांसफर (Telegraphic Transfer - TT)

यह मुख्य रूप से बड़े व्यावसायिक लेन-देन या बैंक की अपनी शाखाओं के बीच तत्काल पैसे भेजने का एक पुराना तरीका था ,इसमें एक बैंक शाखा दूसरी बैंक शाखा को टेलीग्राफ या फैक्स (Fax) के जरिए एक अधिकृत संदेश भेजती थी, जिसके आधार पर दूसरी शाखा पैसे का भुगतान करती थी। हालांकि, यह आम जनता के लिए बहुत महंगा और जटिल था। यह आम जनता कम ही इस्तेमाल करती थी , बड़े व्यापारी जिसको रोज लेन देन करना होता था वहीं इस्तेमाल करते थे ।

4. मेल ट्रांसफर (Mail Transfer - MT)

यह डिमांड ड्राफ्ट का ही एक रूप था, लेकिन इसमें एक बैंक शाखा सीधे दूसरी शहर की बैंक शाखा को डाक (Mail) के जरिए पत्र भेजकर भुगतान करने का निर्देश देती थी। इसमें भी काफी समय लगता था। इसके फॉर्म होते थे जो भर कर भेजे जाते थे ।
अब ये सब पुराने जमाने की बात लगती है , लेकिन इतिहास जानने के लिए यह बताना आवश्यक था , अब आप समझ गए होगे आज का जीवन कितना आसान हो गया है ।

इन पुरानी प्रणालियों में कागजी कार्रवाई बहुत ज्यादा होती थी, मैन्युअल गलतियों की गुंजाइश रहती थी और पैसों के ट्रांसफर में कई दिन लग जाते थे।पहले बैंक का इस्तेमाल  बहुत कम लोग करते थे , आम आदमी कैश से ही काम कर लेता था। NEFT और RTGS जैसे टेक्नोलॉजी  के आने से यह  प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल  और बहुत आसान बना दिया और कुछ ही मिनटों या घंटों में आपका काम हो जाता है ।

क्या आप जानते है ?

NEFT (National Electronic Funds Transfer) का इतिहास भारत की डिजिटल बैंकिंग और वित्तीय सुधारों का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा खुदरा भुगतान (Retail Payments) को तेज, सुरक्षित और कागज-मुक्त बनाने के लिए लाया गया था।

NEFT के विकास और सफर के मुख्य ऐतिहासिक पड़ाव निम्नलिखित हैं:

 शुरुआत से पहले की व्यवस्था (SEFT)

NEFT से पहले, RBI ने नवंबर 2001 में SEFT (Special Electronic Funds Transfer) की शुरुआत की थी। यह चुनिंदा शहरों और चुनिंदा बैंकों की शाखाओं के बीच ही काम करती थी। इसकी सीमाएं बहुत थीं और यह देशव्यापी नहीं थी, इसलिए इसे एक व्यापक और बेहतर प्रणाली से बदलने की जरूरत महसूस हुई।

 NEFT की आधिकारिक शुरुआत (नवंबर 2005)

पुरानी SEFT प्रणाली को पूरी तरह से बंद करके RBI ने नवंबर 2005 में आधुनिक NEFT प्रणाली की शुरुआत की। इसका मुख्य उद्देश्य देश के किसी भी कोने से एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में इलेक्ट्रॉनिक तरीके से आसानी से पैसे ट्रांसफर करना था।

 बैच प्रोसेसिंग (Batch System) का दौर

शुरुआत में NEFT तुरंत (Real-Time) पैसे ट्रांसफर नहीं करता था। यह बैच (Batch) के आधार पर काम करता था। शुरुआत में दिनभर में इसके कुछ ही तय समय (बैच) होते थे मुश्किल से ६ या ७ बैच होते थे दिन भर में । जैसे-जैसे डिजिटल लेन-देन बढ़ने लगे, RBI ने बैचों की संख्या बढ़ाई और बाद में इसे घटाकर आधे-आधे घंटे (Half-hourly batches) का कर दिया गया, जिससे ग्राहकों को दिनभर में कई बार जल्दी पैसे ट्रांसफर होने की सुविधा मिलने लगी।

 24x7x365 उपलब्धता (दिसंबर 2019)

डिजिटल बैंकिंग को बढ़ावा देने के लिए RBI ने 16 दिसंबर 2019 से NEFT सेवा को साल के सातों दिन, 24 घंटे और छुट्टियों के दिन भी चालू कर दिया। इसके बाद से ग्राहकों को बैंक के कामकाजी घंटों या छुट्टियों का इंतजार करने की जरूरत खत्म हो गई।

बेनिफिशरी नेम वेरिफिकेशन (अक्टूबर 2024):
सुरक्षा को और मजबूत करने और फ्रॉड रोकने के लिए RBI ने इसमें खाताधारक का नाम सत्यापित करने की सुविधा अनिवार्य कर दी, ताकि पैसे ट्रांसफर करते समय असली नाम दिखाई दे सके। आज आप दूसरे बैंक का अकाउंट भी वेरिफाई कर सकते है ।

आज NEFT भारत की भुगतान प्रणालियों (जैसे UPI और RTGS) के साथ मिलकर देश की अर्थव्यवस्था की एक मजबूत और भरोसेमंद नींव बन चुका है।



NEFT कैसे काम करता है? 

NEFT प्रणाली बैच (Batch) के आधार पर काम करती है, यानी पैसे तुरंत एक खाते से दूसरे खाते में सीधे ट्रांसफर नहीं होते, बल्कि यह एक तय समय अंतराल में समूह बनाकर प्रोसेस होते हैं। आइए पूरे प्रक्रिया को विस्तार से समझते है ।

 १. विवरण दर्ज करना:

 पैसे भेजने वाले को इंटरनेट बैंकिंग या मोबाइल बैंकिंग ऐप में पाने वाले (Beneficiary) का नाम, खाता संख्या (Account Number), बैंक का IFSC कोड, और ट्रांसफर की जाने वाली राशि दर्ज करनी होती है। जब आप बैंक में फॉर्म भर कर देते है , या अपने इंटरनेट बैंकिंग या मोबाइल बैंकिंग से  पाने वाले का नाम , अकाउंट नंबर, ifsc code , और  धन राशि भरते है ।
 जब आप NEFT का अनुरोध भेजते हैं, तो आपका बैंक उस ट्रांजैक्शन को अपने सिस्टम में दर्ज करता है। आप फॉर्म जमा कर के आ जाते है  या अपने NetBanking या मोबाइल बैंकिंग से submit पर क्लिक करते है , तब बैंक अपने cbs में ट्रांजैक्शन डिटेल दर्ज करता है ।

 बैच प्रोसेसिंग:

 RBI द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार, NEFT ट्रांजैक्शन आधे-आधे घंटे के बैच (Batches) में प्रोसेस किए जाते हैं। यानी दिनभर में हर 30 मिनट पर एक नया बैच बनता है जिसमें उस समयावधि के सभी ट्रांसफर शामिल होते हैं।
 सभी  बैंकों के अनुरोध नेशनल क्लियरिंग सेंटर (जो कि RBI के पास है) पर जाते हैं, जहां बैंकों के बीच पैसों का मिलान और निपटान (Settlement) होता है। सभी बैंकों के सारे ट्रांजैक्शन एक स्थान पर इकट्ठा किए जाते है , और बैंक के अनुसार  डेबिट क्रेडिट फाइनल किया जाता है । सभी बैंकों को अपने ट्रांजैक्शन के अनुसार पैसे ट्रांसफर कर दिए जाते है ।
सभी बैंकों के अपने NEFT/RTGS cell होते है जो इस प्रक्रिया को पूरा करने में भागीदारी निभाते है ।
 
सेटलमेंट की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, पाने वाले (Beneficiary) के बैंक खाते में  उस बैंक द्वारा पैसे जमा कर दिए जाते हैं और भेजने वाले को एसएमएस या ईमेल के जरिए पुष्टि मिल जाती है। संबंधित बैंक अपनी लिस्ट के अनुसार लोगों को पैसे उनके अकाउंट में जमा कर देते है ।

यह सब काम सिस्टम से होता है , इसलिए समय बहुत कम लगता है , और आपको पता नहीं चलता इतना जल्दी इतने ट्रांजैक्शन कंप्लीट हो जाते है ,और अगर किसी के डिटेल्स गलत हो तो पैसा भेजने वाले के  अकाउंट में वापस कर दिया जाता है ।

NEFT की मुख्य विशेषताएँ:


 NEFT सेवा साल के सातों दिन, 24 घंटे और छुट्टियों के दिन भी उपलब्ध है। आप किसी भी समय पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं। इसका टाइम भी बैंक के हिसाब से अलग अलग निर्धारित कर सकते है , आपके बैंक का टाइम पता लगा सकते है आप।

 NEFT के जरिए आप कम से कम (जैसे 1 रुपया) से लेकर कितनी भी बड़ी राशि ट्रांसफर कर सकते हैं (हालांकि अलग-अलग बैंक अपनी तरफ से दैनिक सीमा तय कर सकते हैं)।
 
RBI के सुरक्षित नेटवर्क पर काम करता है, और इसमें बेनिफिशरी का नाम वेरीफाई करने की सुविधा पहले नहीं मिलती थी अभी कुछ महीने पहले शुरू की गई है। 

NEFT पर चार्ज कितना होता है ?

यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप पैसे कैसे ट्रांसफर कर रहे हैं।
1. ऑनलाइन NEFT (इंटरनेट बैंकिंग या मोबाइल ऐप):
 पूरी तरह मुफ्त (Free)
 यदि आप अपने सेविंग अकाउंट (बचत खाता) से मोबाइल बैंकिंग, नेट बैंकिंग या बैंक के ऐप के जरिए खुद ऑनलाइन NEFT करते हैं, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के दिशानिर्देशों के अनुसार अधिकांश बैंक कोई शुल्क नहीं लेते हैं। लेकिन अपने बैंक के चार्जेज अवश्य पता कर ले ।

 यदि आप बैंक की शाखा (Branch) में जाकर फॉर्म भरकर NEFT करवाते हैं, तो बैंक उस पर शुल्क (Service Charge) वसूलते हैं।
 यह शुल्क ट्रांसफर की जाने वाली राशि के स्लैब (Slab) के हिसाब से अलग-अलग होता है। जैसे:
   * 10,000 रुपये तक: लगभग ₹2.50 से ₹5 + GST
   * 10,000 से 1 लाख रुपये तक: लगभग ₹5 से ₹10 + GST
   * 1 लाख से 2 लाख रुपये तक: लगभग ₹15 से ₹25 + GST
   * 2 लाख रुपये से अधिक: लगभग ₹25 से ₹50 + GST

अगर कोई दूसरा व्यक्ति आपके खाते में NEFT के जरिए पैसे भेजता है, तो पैसे प्राप्त करने पर (Inward Credit) बैंक कोई चार्ज नहीं काटते हैं।

सलाह: हमेशा मोबाइल या नेट बैंकिंग के जरिए ही NEFT करें, ताकि आप अतिरिक्त ब्रांच चार्ज से बच सकें। NEFT करने से पहले अपने बैंक के charges अवश्य जान ले ।

इस लेख में हमने NEFT से जुड़ी सभी विषयों पर चर्चा करने का प्रयास किया । अगली बार आप जब NEFT करने जाएंगे तो आपको उसके बारे में सब कुछ जानकारी होगी । यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।
धन्यवाद।





RD (Recurring Deposit) रिकरिंग डिपॉज़िट क्या है ?

 RD  (Recurring Deposit) रिकरिंग डिपॉज़िट

Rd
RD benefits


रिकरिंग डिपॉज़िट (Recurring Deposit, संक्षेप में RD) बैंकिंग और पोस्ट ऑफिस की एक बेहद लोकप्रिय बचत योजना है। यह उन लोगों के लिए सबसे उत्तम विकल्प है जो एकमुश्त (Lump sum) बड़ी रकम निवेश नहीं कर सकते, लेकिन हर महीने छोटी-छोटी बचत करके एक बड़ा फंड तैयार करना चाहते हैं।  रिकरिंग मतलब थोड़ा थोड़ा होता है , इसमें आप थोड़ा थोड़ा पैसा हर महीने डाल सकते है |  पिछले लेखों में हमने बचत खाता , चालू खाता , Fixed Deposit और पीपीएफ के बारे में भी समझा  इससे पहले  के लेख आपको पढ़ने है तो यहां क्लिक कर बचत खाता, चालू खाता, फिक्स्ड डिपॉजिट, पीपीएफ  के बारे में जान सकते है , अब आइए  रिकरिंग डिपॉज़िट के विषय में चर्चा करते है |

RD में सब कुछ fd की तरह ही होता है , INTEREST पहले से फिक्स होता है , Rd कितने साल की होगी वो भी तय होता है , आप हर महीने कितना पैसा डालेंगे वो भी तय होता है , और मैचुरिटी पर आपको पैसा INTEREST के साथ वापस मिल जाता है , इसको समझने से पहले fd  से संबंधित लेख अवश्य पढ़ ले , आइए अब विस्तार से चर्चा करते है |

आरडी (RD) की मुख्य विशेषताएं

नियमित मासिक बचत: 

इसमें हर महीने एक निश्चित तारीख को तयशुदा राशि (जैसे ₹500, ₹1,000 या उससे अधिक) जमा करनी होती है। आप इसमें हर महीने अपने सुविधानुसार पैसा जमा कर सकते है |जैसे Fd में आपको एक बार में पैसा जमा करना होता है , वैसे यहां नहीं होता , आप अपने बचत अनुसार , हर महीने 100,200,500, 1000 या 5000 या और आप जितना चाहे जमा कर सकते है | सबसे बड़ा फायदा यही है कि थोड़ा थोड़ा पैसा जमा हो जाता है हर  महीने और आपको एक बार मैचुरिटी में ज्यादा  पैसा मिलता है |

निवेश की अवधि: 

आरडी की सामान्य अवधि 6 महीने से लेकर 10 साल तक हो सकती है। आप अपनी वित्तीय आवश्यकता के अनुसार अवधि चुन सकते हैं।  अलग अलग बैंकों में इसमें थोड़े बदलाव हो सकते है , आप RD खोलने से पहले अवश्य जान ले अवधि के बारे में | अपने बैंक से  जानकारी प्राप्त कर ले कि उनके पास कितने कितने  महीने की रिकरिंग डिपॉजिट स्कीम  उपलब्ध है |

ब्याज दरें: 

इस पर मिलने वाला ब्याज आमतौर पर साधारण बचत खाते (Savings Account) से काफी अधिक होता है और यह लगभग फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के समान ही होता है। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है RD  में सब कुछ FD की तरह ही होता है , ब्याज दोनों का  समान ही होता है , बस इसमें आप जितना पैसा डालते  जाएगे उस पर आपको ब्याज मिलता रहेगा  |आरडी पर मिलने वाले ब्याज की गणना हर तिमाही (Quarterly Compound) आधार पर की जाती है, जिससे कुल रिटर्न बढ़ जाता है। मतलब आपके ब्याज  की गणना साल में 4 बार होती है , जितना पैसा आपके RD अकाउंट में उस समय होता है , जैसे जैसे  आपका पैसा बढ़ता   है ,  ब्याज बढ़ता  जाता है |


क्या आप  जानते है ?

रिकरिंग डिपॉजिट (Recurring Deposit - RD) का इतिहास बैंकिंग सुधारों, वित्तीय समावेशन और आम जनता में बचत की आदत डालने की जरूरत से जुड़ा हुआ है। 

 शुरुआती दौर में पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली मुख्य रूप से अमीर या बड़े व्यापारियों के लिए हुआ करती थी, जहाँ फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) या एकमुश्त निवेश का चलन था। लेकिन छोटे वेतनभोगियों, किसानों और मध्यम वर्ग के लिए हर महीने एक तय छोटी रकम बचाना ही संभव था। इस जरूरत को पूरा करने के लिए दुनिया भर में (विशेषकर ब्रिटिशकालीन भारत और सहकारी बैंकिंग मॉडल में) रिकरिंग/किस्तों वाली जमा योजनाओं की रूपरेखा तैयार की गई।

 भारत में डाकघर (Post Office) और बैंकों की भूमिका

भारत में औपचारिक वित्तीय पहुंच बढ़ाने के लिए सरकार और बैंकों ने ऐसी योजनाएं शुरू की  जो छोटे निवेशकों को आकर्षित कर सकें। आजादी के बाद और खासकर 1960-70 के दशक के राष्ट्रीयकरण के बाद, भारतीय बैंकों ने घर-घर तक बैंकिंग पहुंचाने के लिए RD को एक प्रमुख टूल बनाया। इसके अलावा, भारत सरकार के डाक विभाग (India Post) ने  'नेशनल सेविंग्स रिकरिंग डिपॉजिट'  के जरिए देश के दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों तक इसे पहुंचाया, जहां बैंक आसानी से उपलब्ध नहीं थे।

 आर्थिक सुधार (1991) के बाद का बदलाव:

 1991 के उदारीकरण (Liberalization) के बाद भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ी। इस दौरान बैंकों ने RD पर आकर्षक ब्याज दरों की पेशकश की, जिससे यह मध्यम वर्ग के लिए बच्चों की पढ़ाई, शादी या घर खरीदने जैसे लक्ष्यों को पूरा करने का सबसे लोकप्रिय और सुरक्षित जरिया बन गया।आज भी यह खाता काफी लोकप्रिय है ।


आरडी (RD) के प्रमुख लाभ

 1. हर महीने पैसे जमा करने की बाध्यता के कारण लोगों में बचत करने की अच्छी आदत विकसित होती है। आप धीरे धीरे हर  महीने पैसा बचाना सिख जाते है |

 2.  बाज़ार के उतार-चढ़ाव (Market Risks) से पूरी तरह मुक्त है, इसलिए इसमें आपका मूलधन और रिटर्न पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं। बैंक द्वारा जितना पैसा आपको बताया जाता है उतना पैसा आपको मिलता है इंटरेस्ट के साथ |

 3. यदि आपको अचानक पैसों की जरूरत पड़ जाए, तो कई बैंक और वित्तीय संस्थान आरडी में जमा राशि के आधार पर 90% से 95% तक लोन या ओवरड्राफ्ट की सुविधा देते हैं। जैसे आपको FD में लोन की सुविधा थी , यहां भी आपको लोन की सुविधा प्राप्त होती है |इसकी पूरी जानकारी आप अपने बैंक से प्राप्त कर सकते है ।

 4. आप बहुत ही कम राशि (बैंक के अनुसार न्यूनतम ₹100) से अपना आरडी खाता शुरू कर सकते हैं। FD के लिए अधिक पैसे की आवश्यकता थी, RD में आप थोड़ा थोड़ा हर महीने जमा कर सकते है |

आरडी खाता कौन खोल सकता है?

 * कोई भी भारतीय नागरिक व्यक्तिगत रूप से या संयुक्त (Joint) नाम से यह खाता खोल सकता है।

 * माता-पिता नाबालिग (Minor) बच्चों के नाम पर भी आरडी खाता संचालित कर सकते हैं।

 * वरिष्ठ नागरिकों (Senior Citizens) के लिए बैंक सामान्य नागरिकों की तुलना में थोड़ी अधिक ब्याज दर प्रदान करते हैं।

और अच्छे से समझने के लिए  नीचे एक चार्ट दिया जा रहा है जब आप  हर महीने 1000/- जमा करते है ५ साल और सालाना दर 7 percent है तो आपको कितना पैसा मिलेगा आइए देखते है ।

Rd chart

आप अपने बैंक में जाकर RD अकाउंट खोल सकते है , या ऑनलाइन भी अपने इंटरनेट बैंकिंग या मोबाइल बैंकिंग के माध्यम से घर बैठे अकाउंट खोल सकते है , आज लगभग सभी बैंक यह सुविधा प्रदान करते है | इस लेख के  माध्यम से हमने RD अकाउंट से संबंधित विषयों पर चर्चा की , कोई भी RD खोलने से पहले उसके बारे में जानकारी अवश्य प्राप्त कर ले , इसका एक फायदा यह भी है कि , जब interest रेट ज्यादा हो तब RD खुलवा ले , तो आपको वही इंटरेस्ट जब तक RD रहेगी तब तक मिलता रहेगा | मै आशा करता हु कि  आपने इस लेख से जानकारी अवश्य ग्रहण की होगी | यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद |

धन्यवाद |